रचनाएं
आदिश्वर वन्दना...
प्रभु आदिश्वर, करूणा सागर,
हे जग के अखिलेश।।
अन्तरयामी तुमने राह दिखाई जग को धर्म की
करके तपस्या प्रभु तोड़ी जंजीरे बान्धे कर्म की
भाग्य विधाता, जीवन त्राता, हे जन जन हृदयेश।।
प्रथम बने थे याचक प्रथम ही कहाए, प्रभुवर तीर्थकर
मानव संस्कृति का जो मंत्र दिया था अभिनव राजेश्वर
महक उठी, वह माटी जिस पर दिया सत्य सन्देश।।
धन्य हुई मानवता पा उस सच्चे अणगार को
शीश झुकाएं हम सब मिलकर संस्कृति के अवतार को
स्वच्छ बनाए, दिल का दर्पण, ध्या कर ध्यन हमेश।।
वन्दना चरणों में।।