भगवान ऋषभ और श्रेयांसकुमार: भव भ्रमण यात्रा

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साध्वी मंजुलयशा

भगवान ऋषभ और श्रेयांसकुमार: भव भ्रमण यात्रा

भगवान ऋषभ जैन धर्म के अलौकिक महापुरुष हुए है। 4000 लोगों के साथ दीक्षा लेने वाले ऋषभ कि साधना अद्भुत थी। साधिक तेरह महीनों तक निराहार तप करने वाले भगवान ऋषभ का पारणा उनके प्रपौत्र श्रेयांसकुमार के हाथों से हुआ ।
प्रश्न हैं ? ऐसा क्यों ? उनका पारणा श्रेयांस के हाथ से ही क्यों हुआ? उनके परिवार के अन्य अनेक सदस्य भी थे । भरत, बाहुबली, ब्राह्मी, सुन्दरी और उनके 98 पुत्र, माता मरुदेवा आदि अनेक पारिवारिक, जन होते हुए भी क्यों प्रकृति ने श्रेयांस कुमार को Select किया।
तो इसके लिए हमे जानना होगा उनका पूर्व भव। वह ऋणानुबंध जिसके कारण भगवान ऋषभ और श्रेयांस का सम्बन्ध बना |
पूर्व के लगभग 8 भवों से ऋषभ और श्रेयांस का सम्बन्ध था और नवमें भव में वे बनते हैं भगवान ऋषभ और प्रपौत्र श्रेयांस कुमार । इतिहास के झरोखे में ....
पहले भव
दूसरे इशान देवलोक में श्रीप्रभ नामक विमान के अधिपति ललितांग देव थे। उसकी प्रधान देवी का नाम स्वयंप्रभा था। दोनों का पारस्परिक राग भाव प्रबल था। यह स्वयं प्रभा श्रेयांस की आत्मा हैं। और ललितांग भगवान ऋषभ की आत्मा हैं।
दूसरा भव
ललितांग देव के रूप में आयु पूर्ण कर भगवान ऋषभ की आत्मा में महाविदेह क्षेत्र की पुष्कलावती विजय में स्थित लोहार्गल नगर के राजा स्वर्णजंघ की महारानी लक्ष्मी की कुक्षि से पुत्र रूप में उत्पन्न हुआ। उसका नाम वज्रजंघ रखा गया। पूर्व भव की देवी स्वयंप्रभा का जीव इसी विजय की पुण्डरीकिणी नगरी के नरेश वज्रसेन की पुत्री श्रीमती के रूप में उत्पन्न हुआ।
श्रीमती युवा हुई। एक दिन वह महल की छत पर बैठी थी। उस समय कुछ देवविमान उसे दृष्टिगोचर हुए। उन्हें देखकर उसे जातिस्मरण ज्ञान हो गया। उसे अपने पूर्व भव के पति ललितांग देव का स्मरण हो गया। उसने यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि इस जन्म में मेरे पति वे ही होंगे। जब तक वे नहीं मिलेंगे, मैं किसी से नहीं बोलूंगी।
श्रीमती की पंडिता नामक अभिन्न सखी थी। वह बहुत चतुर थी। उसने अपनी सहेली के मौनव्रत के कारण को जान लिया। श्रीमती की सहायता से पंडिता ने ललितांग देव के श्रीप्रभ विमान का चित्र (Sketch) बनाया और उसमें कुछ त्रुटियां रहने दी। उस चित्रपट को राजपथ पर टांग दिया। राजकुमार वज्रजंघ घूमते-घूमते उधर से निकला। राजपथ पर टंगे उस चित्रपट को देखकर उसे जातिस्मरण ज्ञान हो गया। उसने उस चित्रपट में रही त्रुटियों को ठीक कर दिया। इस बात की जानकारी श्रीमती व उसके पिता वज्रसेन को लगी। खूब धूमधाम से श्रीमती का वज्रजंघ के साथ विवाह कर दिया।
दोनों सुखपूर्वक रहने लगे। दोनों ने दीक्षा स्वीकार करने के निश्चय के साथ सोए कि कल पुत्र का राज्याभिषेक करना है। अपने माता-पिता को मारकर राज्य प्राप्त करने के लिए राजकुमार ने उनके कमरे में विषमिश्रित धुआं छोड़ दिया जिससे वे दोनों मृत्यु को प्राप्त हो गए।
तीसरा भव
परिणामों की सरलता के कारण राजा वज्रजंघ व रानी श्रीमती का जीव उत्तरकुरु क्षेत्र में तीन पल्योपम आयुमान के यौगलिक बने।
चौथा भव
यौगलिक आयु भोगकर दोनों पहले सौधर्म देवलोक में देव बने ।
पांचवा भव
जंबूद्वीप के महाविदेह क्षेत्र स्थित क्षितिप्रतिष्ठ नगर में सुविधि वैद्य रहता था। सौधर्म देवलोक से च्यव कर वज्रजंघ का जीव उस वैद्य का पुत्र बना। उसका नाम रखा गया जीवानंद। श्रीमती का जीव देवायु भोगकर उसी नगर के श्रेष्ठी ईश्वरदत्त का केशव नाम से पुत्र हुआ। लगभग उसी समय उसी नगर में चार अन्य बालकों ने जन्म लिया-पहला राजपुत्र महीधर, दूसरा मंत्रीपुत्र सुबुद्धि, तीसरा श्रेष्ठीपुत्र गुणाकर तथा चौथा सार्थवाह पुत्र पूर्णभद्र। ये छहों बचपन से अंतरंग मित्र थे। इनकी मैत्री प्रगाढ़ थी। सभी मित्र अपनी-अपनी कुल परंपरा के अनुरूप कार्य में निष्णात बन गए और कार्य में संलग्न बन गए।
एक दिन पांचों मित्र जीवानंद वैद्य के घर पर बैठे थे। उस समय एक तपस्वी मुनि उधर से निकले। सबको लगा-मुनि व्याधिग्रस्त हैं। अपने मित्र जीवानंद वैद्य से उपचार के बारे में पूछने पर उसने बताया- 'प्रतिकूल आहार आदि कारणों से मुनि के शरीर में कृमिकुष्ठ रोग उत्पन्न हो गया लगता है। इनका इलाज तो संभव है पर उसके लिए अपेक्षित सामग्री में से लक्षपाक तेल तो मेरे पास है पर अन्य दो वस्तुएं रत्नकंबल व गोशीर्ष चंदन मेरे पास नहीं हैं। इतनी व्यवस्था हो जाए तो मैं इलाज कर दूंगा।'
पांचों साथी इसके लिए बाजार में गए। नगर के एक बड़े व्यापारी की दुकान पर रत्नकंबल व गोशीर्ष चंदन के बारे मे पूछा तो उनका मूल्य दो लाख मुद्रा बताया। व्यापारी ने इतनी कीमती वस्तुओं के भाव पूछने का कारण जानना चाहा तब उन्होंने तपस्वी मुनि के रोगोपचार के लिए इन वस्तुओं को आवश्यक बताया। तरुणों की सेवा भावना व श्रद्धा से प्रभावित होकर व्यापारी ने बिना मूल्य लिए दोनों वस्तुएं उनको दे दी। छहों मित्र ध्यानावस्थित मुनि के पास पहुंचे। वैद्यपुत्र जीवानंद ने मुनि को वंदन किया, पूरे शरीर पर लक्षपाक तेल का मर्दन किया और रत्नकंबल से आवेष्टित कर दिया। शरीर में स्थित कृमि बाहर आ गए। रत्नकंवल को हटाया और फिर गोशीर्ष चंदन का लेप किया। मुनि को पूर्ण निरोग देखकर सभी मित्र परम प्रसन्न हुए। मुनि के उपदेश से सभी ने श्रावक धर्म स्वीकार किया। कालांतर में सभी मित्रों ने दीक्षा स्वीकार की। अंतिम समय में अनशनपूर्वक समाधि मृत्यु को प्राप्त किया।
छठा भव
वहां से मरकर वे छहों बारहवें अच्युत देवलोक में महर्धिक देव वने।
सातवां भव
जंबूद्वीप के पूर्व महाविदेह की पुष्कलावती विजय में लवण समुद्र के पास पुंडरीकिणी नगरी में राजा वज्रसेन राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम धारिणी था। इसी भव में बारहवें देवलोक से वैद्य जीवानंद का जीव धारिणी की कुक्षि से पुत्र रूप में उत्पन्न हुआ। गर्भ में आने पर माता ने चौदह महास्वप्न देखे । चक्रवर्ती पुत्र के जन्म की भविष्यवाणी से सबको प्रसन्नता हुई। पुत्र का नाम वज्रनाभ रखा गया। कालांतर से जीवानंद के शेष चार मित्र देवायु भोगकर धारिणी के उदर से उत्पन्न हुए। वे वज्रनाभ के छोटे भाई हुए। उनके नाम क्रमशः ये थे-बाहु, सुबाहु, पीठ और महापीठ। उसका छठा मित्र केशव का जीव भी वहां किसी अन्य राजा के महल में सुयश नामक पुत्र बना। वह भी बाल्यकाल से यहीं रहने लगा। ये छहों राजपुत्र साथ में रहते थे। पूर्व जन्म के स्नेह वश इनमें गहरी मित्रता थी। महाराज वज्रसेन अपने ज्येष्ठ पुत्र वज्रनाभ को राज्य सौंपकर दीक्षित हुए। केवलज्ञान की प्राप्ति के बाद वज्रसेन ने तीर्थ की स्थापना की और तीर्थंकर बने।
कुछ समय बाद वज्रनाभ की आयुधशाला में चक्र रत्न की उत्पत्ति हुई। चक्ररत्न की सहायता से वे चक्रवर्ती बने। उनके चार भाई मांडलिक राजा बने। सुयश चक्रवर्ती का सारथी बना। इस भव में भी भगवान ऋषभ और श्रेयांस की आत्मा सबसे निकट रही। एक बार तीर्थंकर वज्रसेन पुंडरीकिणी नगरी में पधारे। समवसरण की रचना हुई। तीर्थंकर की देशना हुई। भगवान् के उपदेश से वैराग्य को प्राप्त राजा वज्रनाभ ने अपने पुत्र को राज्य सौंपा और देवाधिदेव वज्रसेन से दीक्षित हो गए। बाहु, सुबाहु, पीठ, महापीठ एवं सुयश ने भी साधुत्व को स्वीकार किया।
मुनि वज्रनाभ ने निरतिचार संयम का अनुपालन करते हुए तीर्थंकर गोत्र का उपार्जन किया। बाहु व सुबाहु मुनि अत्यन्त सेवाभावी थे। वृद्ध, ग्लान, रोगी व बाल साधुओं के लिए तो वे आश्रय स्थल थे। वे निरंतर सेवा में संलीन रहते थे। विशुद्ध व निस्पृह सेवावृत्ति के कारण दोनों मुनियों ने उच्चतर पुण्यप्रकृति का बंध किया। पीठ तथा महापीठ मुनि ज्ञानार्जन करते रहते थे। प्रवचन करने व समझाने की कला में वे अत्यन्त कुशल थे। एक बार गुरु के श्रीमुख से बाहु व सुबाहु मुनि की प्रशंसा सुनकर पीठ व महापीठ मुनि के भीतर ईर्ष्या व मत्सर भाव जागृत हो गया। इस कारण दोनों मुनियों के स्त्री वेद का बंध हो गया। सुयश मुनि ने उत्कृष्ट साधना की। अंतिम समय में छहों मुनिवरों ने पादोपगमन अनशन स्वीकार किया।
आठवां भव
वहां से आयु संपन्न कर अगले भव में तेंतीस सागरोपम स्थिति वाले सर्वार्थसिद्ध विमान में देव बने।
नवमां भव
वहां से व्यवकर मुनि वज्रनाभ का जीव ऋषभदेव बने । बाहु मुनि का जीव भरत चक्रवत, सुबाहु मुनि का जीव बाहुबली के रूप में जने । पीठ मुनि ने ब्राह्नी व महापीठ मुनि ने सुंदरी के रूप में जन्म लिया। सारथी सुयश मुनि ने श्रेयांसकुमार के रूप में जन्म लिया जिन्होंने इक्षु रस का दान देकर दान की स्वस्थ परंपरा का शुभारंभकिया। इन नव भावों तक साथ रहने वाले भगवान ऋषभ और श्रेयांस की आत्मा इस अवसर्पिणी काल के प्रथम याचक और प्रथम दाता बन गए।