रचनाएं
रोम-रोम से निकले भगवन्
रोम-रोम से निकले भगवन् नाम तुम्हारा हां नाम तुम्हारा
मरुदेवा के लाल लाडले वंदन लो हमारा।। ध्रुव ।।
दीक्षा ली थी जब प्रभु ने, लोग थे अज्ञानी,
नहीं जानते थे बहराना, अन्न और पानी,
तप संयम आराधना से, तोड़ी कर्म की कारा।।
रोम- रोम से निकले...
जिसने सब कुछ छोड दिया, बन गया समताधारी,
अपनी ही पहचान से, मिट गई दुविधा सारी,
योगीश्वर के ज्ञान स्वरूप से, जग पाए उजियारा।।
रोम -रोम से निकले...
आदि कर्ता प्रभुवर ने, मोक्ष मार्ग दिखलाया,
करुणा मैत्री प्रेम से, अमृत रस बरसाया,
त्रिभुवनतारी नेत्रहारी बन गया सबल सहारा।।
रोम-रोम से निकले...….
अक्षय तृतीया आई, नई रोशनी लाई,
सुपात्र दान की, महिमा जग में छाई,
वर्षीतप की साधना से, मिट जाए अंधियारा।।
रोम-रोम से निकले...
तर्ज - जन्म जन्म का साथ है...