रचनाएं
भगवान ऋषभ के पारणे के उपलक्ष में मनाया जाता है अक्षय तृतीया पर्व
हर पर्व के पीछे कोई घटना प्रसंग अवश्य होता हैं। जैन धर्म एक आध्यात्मिक धर्म है, जिससे आत्मा, स्वास्थ, प्रर्यावरण सबका हित सधता है। जैन धर्म में भी कई पर्व मनाये जाते है। जिससे लोगों में आध्यात्मिक संस्कार बढ़ते रहे।
कई पर्वों में एक पर्व है अक्षय तृतिया, यह पर्व जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ नाथ भगवान के पारणे के उपलक्ष में मनाया जाता हैं। भगवान ऋषभ ने चैत्र कृष्णा अष्टमी से तप प्रारंभ किया। नवमी को दीक्षा ग्रहण की परंतु जनता को मिथा चर्चा की जानकारी नहीं होने के कारण तेरह महिने दस दिन तक भगवान ऋषभ गोचरी के लिए श्रमण करते रहे। परंतु प्रासुक एवं आहार पानी की उपलब्धि नहीं होने के कारण इतना लंबा समय व्यतीत हो गया।
एक दिन भगवान के प्रपोत्र श्रेयांस कुमार को मेरू सिंचन का स्वप्न आया और सुबह भगवान के ज्योति दर्शन हुए, उसने सोचा इनसे बढकर मेरू कौन हो सकता है। घर में भेट स्वरूप इक्षु घट के घड़े आये हुए थे।
श्रेयांस ने भगवान गोचरी की अर्ज की। भगवान को तो ज्ञान था कि यह जो भावना भा रहा है। वह पदार्थ शुद्ध है भगवान महलों की तरफ बढ़े श्रेयांस ने उच्चभावों से भगवान को इक्षु रस बहराया। भगवान के पारणे से केवल मनुष्यों को ही नहीं देवताओं को भी प्रसन्नता की अनुभूति हुई और देवताओं ने प्रसन्तता प्रकट करते हुए अहोदानं अहोदानं की ध्वनि की। तब से अब तक समग्र जैन समाज में ही नहीं अन्य लोगों में वैशाख शुक्ला तृतीया के दिन एक विशेष खुशी का माहौल देखने को मिलता है।
जैन समाज में भगवान की उस तीव्र तपस्या के उपलक्ष में वैसा तो नहीं परंतु चैत्र वदि
अष्टमी से वैशाख शुक्ला तृतिया के उपलक्ष में वैसा तो नहीं एक दिन छोड़कर एक दिन उपवास करके तप करने का क्रम देखने को आज भी मिलता है।
किसान लोग तीज पर खेती की जुताई करते है, कई लोग अक्षय तृतिया दिन को शुभ मानकर विवाह, दुकान– मकान, संस्थानों का मुहुर्त करते है। अक्षय तृतीया को अपूछ सावा भी सुनने को मिलता है। कई घरों में आमली खीचड़ा का प्रचलन देखने को मिलता है। गुजरात और राजस्थान में आम लोग छतों पर पतंग उड़ाते हुए नजर आते हैं।
वास्तव में तो हमें इस दिवस पर तप जप का विशेष प्रयास करना चाहिये, जिससे भगवान की तरह हमारा भी कल्याण हो सके।
तेरापंथ समाज में इस वर्ष अक्षय तृतीया उत्सव महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी के पावन सान्निध्य मे लाडनूं जैन विश्वभारती में मनाया जाएगा। इस वर्ष योगक्षेम वर्ष होने के कारण आगंतुक तपस्वियों का मनोहारी दृश्य देखने का और सैकड़ों साधु-साध्वियों के दर्शनों का भी योग मिल सकेगा।