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अनमोल विरासत–अनमोल इतिहास : अक्षय तृतीया
सौभाग्यशाली परिवार
अंतिम कुलकर नाभि की धर्मपत्नी मरुदेवा की कुक्षी से ऋषभ का जन्म हुआ। प्रभु ऋषभ का परिवार सौभाग्यशाली रहा। जो हम सभी के लिए गौरवशाली है। इस अवसर्पिणी काल के प्रथम राजा, प्रथम साधु, प्रथम भिक्षुक, प्रथम केवली, प्रथम तीर्थकर, भगवान ऋषभदेव हुए। इस अवसर्पिणी काल में सर्वप्रथम सिद्ध बनी माता मरुदेवा। प्रथम चक्रवर्ती बना राजा भरता। इस देश का नाम भारत ऋषभनाथ के पुत्र राजा भरत के नाम से हुआ। वृंदावन में प्रवासित प्रेमानन्दजी महाराज ने भी इस तथ्य को अपने उद्गार में व्यक्त किया है। चक्रवर्ती राजा भरत ने राजमहल में रहते-रहते केवलज्ञान को प्राप्त कर लिया। पुत्र बाहुबली ने भी मोक्ष को प्राप्त किया। पौत्र मरीचि इसी अवसर्पिणी काल में अंतिम चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर हुए। प्रभु ऋषभ की सारी संताने सौ पुत्र एवं दो पुत्री ने संयम को अंगीकार किया। दोनों ही पुत्रियों का नाम सोलह महासतियों में स्वर्णिम अक्षरों से अंकित है। साठ हजार वर्ष तक कठोर आयम्बिल तप की साधना पुत्री सुंदरी ने की जो अपने आप में एक अमिट आलेख है। प्रथम दान दाता का गौरव प्रपौत्र श्रेयांस कुमार ने प्राप्त किया। ऐसे गौरवशाली दुर्लभ संयोग प्रभु ऋषभ के परिवार को प्राप्त हुए।
कुशल नेतृत्व
राजा ऋषभ का शासन प्रारम्भ हुआ। कालचक के बढ़ते प्रवाह के कारण कल्पवृक्ष जो कि सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। धीरे-धीरे खत्म होने लगे। राजा ऋषभ का युग परिवर्तन का युग बना। प्रकृति परिवर्तन के साथ-साथ अनेक विकट समस्याएं भी जन्म लेने लगी। आपसी व्यवहार, सम्बंध में कटुता आने लगी। राजा ऋषभ ने सूझ-बूझ से असि, मसि, कृषि का ज्ञान देकर न केवल जनमानस को त्राण दिया अपितु विकास का रास्ता भी प्रशस्त किया। वहीं से उपयोगी पदार्थों का अविष्कार प्रारम्भ हुआ। राजा का उत्तरदायित्व होता है-प्रजा की सुरक्षा, राज्य में अमन-चैन, आत्मतोष, जनजीवन को सर्वांगीण रूप से सक्षम बनाना। असि, मसि, कृषि के चिंतन से प्रजा को सात्विक गर्व हुआ अपने गौरवशाली कुशल नेतृत्व पर। शांत, सुखी, संतोषी जीवन जीने का मानो मूल मंत्र मिल गया हो।
साधना आत्मतत्व की
जब राजा ऋषभ ने साधुत्व को धारण किया तब चार हजार व्यक्तियों ने उनके साथ संन्यास को स्वीकार किया। साधुत्व स्वीकार कर प्रभु ऋषभ आत्म साधना में तल्लीन हुए। ध्यान, मौन संयम में स्थित आत्मा विशुद्धि की ओर गतिमान थी। प्रभु अपने आप में स्थिर रहते थे। भिक्षा के समय भ्रमण करते उसके अलावा सम्पूर्ण समय आत्मसाधना में लगता। अप्रमत चेतना कैवल्य की ओर आगे बढ़ रही थी। प्रभु आदिनाथ के साथ चार हजार व्यक्तियों ने दीक्षा स्वीकार की कर्मयोग से सभी चले गए। प्रभु एकत्व की भावधारा में सततलीन रहते। चार हजार व्यक्तियों का एक-साथ दीक्षित होना ओर फिर उन सभी का चले जाना संयोग-वियोग के इस उपक्रम में उनका जीवंत संदेश मिला "एकला चलो" क्योंकि प्रभु संयोग एवं वियोग दोनों से ऊपर उठ गए थे। हम सभी के लिए एक प्रेरणा है ममत्व से उपरत रहने की। उनकी शुक्ल ध्यान में अवस्थित जागृत चेतना राग-द्वेष की तरंगों से तरंगित नहीं हुई।
तृतीया जो अक्षय बन गई
प्रभु ऋषभ के पूर्व में बंधे हुए अंतराय कर्म उदय में आए जिसके कारण उन्हें आहार पानी उपलब्ध नहीं होता। प्रभु भिक्षा के लिए हस्तिनापुर के राजमार्ग से जा रहे थे। महल के ग्वाक्ष में राजा श्रेयांस बैठे हुए थे। प्रभु पर दृष्टिपात होते ही उन्हें अपने गत रात्रि में आए स्वप्न की स्मृति ताजा हो गई कि म्लान मेरु पर्वत को मैं सिंचित कर रहा हूं। राजा श्रेयांस तुरंत महल से उतर कर राजमार्ग पर आकर प्रभु आदिनाथ को वंदन किया एवं भिक्षा के लिए अनुरोध किया। प्रभु महल में पधारे। संयोग से उसी दिन इक्षु रस के घड़े भेंट स्वरूप आए हुए थे। शुद्ध प्रासुक इक्षुरस का प्रभु को निवेदन किया। प्रभु ने अवधिज्ञान से देखा और अपने दोनो हाथों की अंजुली आगे की। राजा श्रेयांस कुमार ने प्रभु को इक्षुरस का दान दिया। जैसे ही प्रभु ने दान ग्रहण किया आकाश में देवताओं ने ‘अहोदानं अहोदानं’ का घोष किया। पंच रत्नो की वर्षा हुई। तब तक लोग भिक्षा विधि से अनजान थे। उस दिन लोगों ने भिक्षा विधि एवं उसके महत्व को समझा जाना। वह दिन था वैशाख शुक्ला तृतीया का वह तृतीया अक्षय बन गई। उस दिन प्रभु आदिनाथ के तेरह माह दस दिन की निराहार तपस्या का पारणा हुआ। आज तीसरे से पांचवा आरा आ गया। हजारों वर्ष व्यतीत होने के उपरांत भी उसी स्मृति में हजारों-हजारो व्यक्ति वर्षीतप की साधना करते हैं। एकांतर तपाराधना कर अपने कर्मो की निर्जरा कर रहे हैं। अक्षयतृतीया का यह पर्व जैन धर्म में प्रभु आदिनाथ के साथ जुड़ा हुआ है। इस दिन के बारे में हम चिंतन करें अनजाने में राजा ऋषभ के बंधे हुए अंतराय कर्म के कारण से उन्हें तेरह महीने दस दिन आहार उपलब्ध नहीं हुआ। जानबूझकर जो हम किसी को अंतराय देते हैं तो सोचे उसका परिणाम क्या होगा ? आगमवाणी का सूत्रांश है- "कडाण कम्माण न मोक्ख अत्थि" किए हुए कर्म को भोगे बिना छूटकारा मिलता नहीं है। हमारा भाव रहे कि धर्म के पथ पर किसी को अंतराय नहीं देकर अपितु सहयोग करेंगे जिससे कर्म का बंधन न होकर उससे मुक्ति पा सकें। यह अक्षय तृतीया का पर्व प्रभु ऋषभ की स्मृति के साथ-साथ हमे यह भी संदेश देता है कि हमारी आत्मा भी प्रभु ऋषभ की तरह कर्म का क्षय कर अक्षय अमर पद को प्राप्त करें। इस पर्व को हम न केवल परम्परा के रूप में मनाए बल्कि कर्म बंधन एवं कर्म मुक्ति पर चिंतन-मनन करेंगे तभी इस पर्व की सार्थकता होगी।