प्रमाद और कषाय से मुक्ति ही जीवन का असली जन्मोत्सव : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 25 अप्रैल, 2026

प्रमाद और कषाय से मुक्ति ही जीवन का असली जन्मोत्सव : आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी का 65वां जन्मोत्सव 'तेरापंथ की राजधानी' लाडनूं में अभूतपूर्व गरिमा और उल्लास के साथ मनाया गया। योगक्षेम वर्ष के प्रवास के दौरान आयोजित इस ऐतिहासिक जन्मोत्सव में चतुर्विध धर्मसंघ का ऐसा उत्साह देखने को मिला, मानों पूरी श्रद्धा लाडनूं की गलियों में उतर आई हो।
सुधर्मा सभा में श्रद्धा का ज्वार : प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के लिए जब आचार्य प्रवर 'सुधर्मा सभा' में पधारे, तो वहां मौजूद हजारों श्रद्धालुओं ने जयघोष के साथ अपने आराध्य का स्वागत किया। कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्यश्री के ओजस्वी महामंत्रोच्चार के साथ हुआ, जिससे पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा।
भक्ति गीतों और भावाभिव्यक्तियों से दी वर्धापना : जन्मोत्सव के इस पावन अवसर पर भावनाओं का अनूठा संगम देखने को मिला।
महिला मंडल व समणी वृन्द : तेरापंथ महिला मंडल-लाडनूं और समणी वृन्द ने मधुर गीतों के माध्यम से गुरु चरणों में अपनी आस्था निवेदित की।
साध्वी समाज की भावांजलि : शासन गौरव साध्वी राजीमती जी, शासन गौरव साध्वी श्री कनक श्री जी और साध्वी वर्या संबुद्धयशा जी ने आचार्यश्री के व्यक्तित्व को 'प्रकाशमान, पारदर्शी और प्रबल पुरुषार्थ का पर्याय' बताया।
संसार पक्षीय परिवार : आचार्यश्री के सांसारिक परिवार (दूगड़ परिवार) से साध्वी सुमति प्रभा जी, साध्वी चरित्र यशा जी, साध्वी विशाल यशा जी सहित भाई श्रीचन्द दूगड़ और महेन्द्र दूगड़ ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी।
बाल मन की श्रद्धा: नन्हें बालकों और बालिका आद्या बच्छावत की भावाभिव्यक्ति ने उपस्थित जनसमूह को भाव-विभोर कर दिया।
आचार्यश्री का मार्मिक प्रतिबोध : 'जन्म क्यों होता है?'
अपने 65वें जन्मोत्सव पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए महातपस्वी आचार्यश्री ने 'जन्म और कर्म' के गूढ़ रहस्यों को अत्यंत सरल भाषा में समझाया। आचार्यश्री ने फरमाया:
'आगमों के अनुसार, प्रमाद और हमारे भीतर विद्यमान कषाय—क्रोध, मान, माया, लोभ—ही पुनर्जन्म के मूल कारणों को सींचते हैं।
जन्म-मृत्यु का यह चक्र दुख का कारण है, लेकिन मानव जन्म मिलना एक महान अवसर है। बिना मानव देह पाए इस चक्र से मुक्ति संभव नहीं है। जन्म लेना पूर्व कर्मों का फल (भाग्य) हो सकता है, लेकिन इस जीवन में 'सत्पुरुषार्थ' करना पूरी तरह हमारे अपने हाथ में है।'
शासन माता का भावपूर्ण स्मरण : आचार्यश्री ने अपनी देशना के दौरान शासन माता साध्वी प्रमुखा श्री कनक प्रभा जी का विशेष रूप से स्मरण किया। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि लाडनूं में इस 'योगक्षेम वर्ष' का आयोजन उन्हीं के विशेष निवेदन पर स्वीकार किया गया था। यह आयोजन उनके संकल्पों की सिद्धि और संघ की अटूट एकता का प्रतीक है।
गणमान्य जनों ने दी विनयांजलि : कार्यक्रम में जैन विश्व भारती के मुख्य न्यासी जयन्तीलाल सुराणा, कुलपति बच्छराज दूगड़, अमृत वाणी के अध्यक्ष ललित कुमार दूगड़ सहित प्रमोद बैद (अध्यक्ष, प्रवास व्यवस्था समिति) और विभिन्न क्षेत्रों से आए पदाधिकारियों ने अपनी विनयांजलि अर्पित की। कार्यक्रम के अंत तक सुधर्मा सभा में श्रद्धालुओं की उपस्थिति गुरु-भक्ति के अनुपम दृश्य को दर्शा रही थी।