गुरुवाणी/ केन्द्र
विवेक ही आत्मा का वास्तविक नेत्र, कषायों का अल्पीकरण ही सच्ची साधना : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के मंगल महामंत्रोच्चार से कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ हुआ। साध्वी वृंद ने 'प्रज्ञा गीत' के संगान से वातावरण को भक्तिमय कर दिया। आचार्य प्रवर के जन्मोत्सव एवं पट्टोत्सव के उपलक्ष्य में वर्धापना का क्रम आज भी उत्साहपूर्वक जारी रहा।
आचार्य श्री की पावन देशना : 'विवेक और कषाय मुक्ति' : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने ‘उत्तरज्झयणाणि’ आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को पावन संबोध प्रदान करते हुए अपने प्रवचन का शुभारंभ किया। आचार्य श्री ने विवेक को धर्म का आधार बताते हुए फरमाया कि विवेक एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, परन्तु हर व्यक्ति को तत्काल विवेक प्राप्त हो जाए, यह सामान्यतया कठिन होता है।
प्रवचन के मुख्य बिंदु इस प्रकार रहे:
अध्यात्म का दृष्टि दान: आचार्य श्री ने फरमाया कि लौकिक जीवन में नेत्रदान का महत्त्व है, किन्तु आध्यात्मिक संदर्भ में किसी को 'सम्यक् दृष्टि' देना, असंयमी को संयमी और अव्रती को व्रती बना देना ही वास्तविक 'दृष्टि दान' और उपकार है।
विवेक की अनिवार्यता: शास्त्रानुसार जागृत विवेक व्यक्ति का एक नेत्र है। जिसके पास न स्वयं का विवेक है और न ही वह विवेकशील पुरुषों की संगति करता है, वह बाहरी नेत्र होने पर भी आध्यात्मिक रूप से अंधा है।
कषायों से पृथकता : विवेक का वास्तविक अर्थ है—कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) को स्वयं से पृथक करना। यद्यपि इनसे पूर्ण मुक्ति कठिन है, फिर भी इनका अल्पीकरण (कमी) करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
क्षमा और सौहार्द : समुदाय में रहते हुए यदि कभी मतभेद हो जाएं, तो मन में गांठ नहीं बांधनी चाहिए। यदि रात को कोई बात हुई हो, तो सुबह तक उसे भुलाकर पुनः सामान्य हो जाना चाहिए।
वात्सल्यपूर्ण अनुशासन : बड़ों को सुधार की दृष्टि से छोटों को कड़ा कहना पड़ सकता है, परन्तु बाद में उन्हें वात्सल्य से संभालना चाहिए ताकि उनका उत्साह और विकास बाधित न हो।
साधुत्व की अखंडता : पूज्य प्रवर ने साधु-साध्वियों को प्रेरणा दी कि प्राप्त संयम जीवन की अंतिम श्वास तक अखंड रहे। अप्रमत्त रहकर आत्मा की रक्षा के साथ-साथ क्षेत्रों में धर्म प्रभावना का प्रयास निरंतर जारी रहे।
श्रद्धाभिव्यक्ति : साधु साध्वी वृंद ने दी भावांजलि : कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साधु-संतों ने अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम से गुरुदेव के प्रति अटूट श्रद्धा निवेदित की। इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित नाम सम्मिलित रहे:
मुनि वृंद : मुनि विनोद कुमार जी, मुनि रजनीश कुमार जी, मुनि निकुंज कुमार जी, मुनि आर्ष कुमार जी, मुनि नम्र कुमार जी, मुनि हेम ऋषि जी, मुनि नमन कुमार जी।
साध्वी एवं समणी वृंद: साध्वी सुश्रुत प्रभा जी, साध्वी स्वर्ण रेखा जी, समणी अमल प्रज्ञा जी, साध्वी चरितार्थ प्रभा जी, साध्वी मेघ प्रभा जी, साध्वी काम्य प्रभा जी, समणी विपुल प्रज्ञा जी, साध्वी धन्य प्रभा जी, साध्वी तेजस्वी प्रभा जी, साध्वी अनन्य प्रभा जी, समणी संगीत प्रज्ञा जी, साध्वी अक्षय प्रभा जी, साध्वी प्रीति प्रभा जी, साध्वी अक्षय विभा जी, साध्वी पद्मप्रभा जी, साध्वी मंदार प्रभा जी, साध्वी श्रेष्ठ प्रभा जी, साध्वी माधुर्य प्रभा जी, साध्वी सुधांशु प्रभा जी, साध्वी जगतवत्सला जी, साध्वी चारूलता जी, साध्वी कीर्तिप्रभा जी, साध्वी रक्षित यशा जी, साध्वी युक्ति प्रभा जी, साध्वी प्रसन्न यशा जी, साध्वी आगम प्रभा जी।
सामूहिक प्रस्तुति : सरदारशहर साध्वी वृंद एवं सिवांची मालानी साध्वी वृंद ने सामूहिक गीतों के माध्यम से आचार्य श्री को वर्धापित किया।