गुरुवाणी/ केन्द्र
बाहरी वस्तुएं नहीं, भीतर बैठा 'मोह' है विकारों का असली कारण : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज चतुर्विध धर्मसंघ को संबोधित करते हुए इंद्रिय विषयों और आत्म-कल्याण के मार्ग पर गंभीर तात्त्विक प्रकाश डाला। आचार्य प्रवर ने स्पष्ट किया कि पांचों इंद्रियों के विषय केवल 'पुद्गल' हैं और वे स्वयं में इतने शक्तिशाली नहीं कि मन में विकार पैदा कर सकें; असली कारक हमारे भीतर का 'मोहनीय कर्म' है।
इंद्रियों का वर्गीकरण : कामी और भोगी इंद्रियां :
आचार्य श्री ने इंद्रियों को दो श्रेणियों में विभाजित करते हुए फरमाया कि कान और आंख 'कामी इंद्रियां' हैं, क्योंकि इनका कार्य केवल शब्द और रूप को ग्रहण करना है। वहीं नाक, जीभ और स्पर्श 'भोगी इंद्रियां' हैं, जो गंध, रस और स्पर्श के साथ संलिप्त रहती हैं। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि इंद्रिय विषय केवल निमित्त बनते हैं, जबकि उपादान कारण मोहनीय कर्म है, जो राग-द्वेष पैदा करता है।
काम-भोग : चुभन और विष के समान : सांसारिक आकर्षणों पर प्रहार करते हुए आचार्य प्रवर ने फरमाया कि काम और भोग 'शल्य' (कांटा) की तरह हैं जो मन में चुभन पैदा करते हैं। उन्होंने इन्हें 'आशीविष सर्प' (जहरीले सांप) के समान बताया, जिनमें संयम चेतना को नष्ट करने की मारक शक्ति होती है।
आचार्य श्री ने सचेत किया कि यदि कोई प्रत्यक्ष सेवन न भी करे, तो भी काम-भोगों के प्रति केवल 'आसक्ति' रखना ही व्यक्ति को दुर्गति की ओर ले जाता है।
वृद्धावस्था और साधना का प्रबंधन:
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने अपने पूर्ववर्ती आचार्यों—आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी का पावन स्मरण किया। पूज्य प्रवर ने प्रेरणा देते हुए फरमाया कि 75 वर्ष की आयु के पश्चात व्यक्ति को लंबी यात्राओं और अनावश्यक भाग-दौड़ से बचकर स्वयं को मौन, जप, स्वाध्याय और ध्यान में नियोजित करना चाहिए। अंत समय में निर्मल भावों के साथ साधना को पुष्ट करना ही आत्म-कल्याण का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।
कार्यक्रम के दौरान बहिर्विहार से लौटीं साध्वी वर्धमान श्री जी एवं साध्वी राजश्री जी ने गुरुदेव के समक्ष अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी।