इच्छाएं अनंत, संतोष ही परम सुख का मार्ग : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 23 अप्रैल, 2026

इच्छाएं अनंत, संतोष ही परम सुख का मार्ग : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में आज जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में वैराग्य का अनूठा दृश्य देखने को मिला। हज़ारों की संख्या में उपस्थित जन समूह के साक्षी में 'मुमुक्षु चंदन' ने सांसारिक मोह-माया का त्याग कर संयम के मार्ग पर कदम बढ़ाए। आचार्य प्रवर ने विधिवत मंत्रोच्चार के साथ उन्हें साध्वी दीक्षा प्रदान की। योगक्षेम वर्ष के दौरान लाडनूं प्रवास का यह तीसरा दीक्षा समारोह था।
इच्छाओं की अनन्तता पर पावन देशना:
दीक्षा समारोह के अवसर पर आचार्य श्री ने 'इच्छा की अनन्तता' विषय पर गंभीर बोध दिया। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि, 'जैसे आकाश का कोई आदि या अंत नहीं है, वह अनन्त है, वैसे ही मनुष्य की इच्छाएं भी अनन्त हैं। मोहग्रस्त व्यक्ति सदैव असंतोष में जीता है, जबकि ज्ञानी और साधु संतोष को धारण कर परम सुख प्राप्त करते हैं।'
आचार्य प्रवर ने शास्त्रों का संदर्भ देते हुए फरमाया कि अध्ययन, जप और दान में कभी संतोष नहीं करना चाहिए, लेकिन भोजन, धन और स्वयं की स्थिति में संतोष अनिवार्य है। उन्होंने भौतिक वस्तुओं के संग्रह से बचने और अपनी संपत्ति पर स्वामित्व की सीमा तय करने (परिग्रह परिमाण) की प्रेरणा दी।
चारित्र ही सर्वश्रेष्ठ रत्न : साध्वी प्रमुखा श्री जी :
साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभा जी ने अपने उद्बोधन में चारित्र (संयम) की महिमा का बखान किया। उन्होंने कहा कि संसार में चारित्र रत्न से श्रेष्ठ कोई दूसरा रत्न नहीं है और न ही इससे बड़ा कोई सुख है। जब व्यक्ति सांसारिक भोगों को तुच्छ समझने लगता है, तभी वह आत्म-विकास के इस कठिन मार्ग पर अग्रसर होता है।
दीक्षा विधि और नया नामकरण :
दीक्षा की प्रक्रिया के दौरान मुमुक्षु चंदन के पिता ने गुरुदेव के चरणों में 'आज्ञा पत्र' समर्पित किया। मुमुक्षु चंदन ने वैराग्यपूर्ण भावों के साथ अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्य श्री ने परिवारजनों से अंतिम अनुमति लेने के बाद आर्षवाणी के साथ मुमुक्षु को दीक्षित किया।
आचार्य श्री की आज्ञा से साध्वी प्रमुखा जी ने नवदीक्षित साध्वी को रजोहरण प्रदान किया और केशलुंचन की विधि संपन्न की। मुमुक्षु चंदन को संयम जीवन का नया नाम 'साध्वी चंदन प्रभा' प्रदान किया गया। इसके साथ ही मुमुक्षु अर्चना को साध्वी प्रतिक्रमण सीखने की अनुमति भी प्रदान की गई।