गुरुवाणी/ केन्द्र
लाखों शत्रुओं पर जीत से बड़ी है 'आत्म-विजय' :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता एवं अहिंसा यात्रा के प्रणेता महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी ने आज 'युद्ध करें: विजय वरें' विषय पर मार्मिक उद्बोधन प्रदान किया।
आचार्य प्रवर ने स्पष्ट किया कि संसार में दूसरों को हराना सरल है, किंतु स्वयं की बुराइयों पर विजय पाना ही वास्तव में 'परम विजय' है।
आचार्य श्री ने 'उत्तरज्झयणाणि आगम' के माध्यम से फरमाया कि संसार में असली योद्धा वह नहीं है जो युद्ध के मैदान में लाखों शत्रुओं को जीतता है, बल्कि असली विजेता वह है जो स्वयं को जीत लेता है।
1. परम विजय क्या है? दुनियावी जीत (दूसरों को हराना) अस्थायी है। एक साधक जब अपनी आत्मा को जीत लेता है, तो उसे 'परम जय' कहा जाता है। इसे ही सच्चा 'धर्मयुद्ध' या 'आत्म-युद्ध' माना गया है।
2. आत्मा के साथ युद्ध कैसे करें? यह युद्ध हथियारों से नहीं, बल्कि प्रवृत्तियों के बदलाव से लड़ा जाता है:
अशुभ योग बनाम शुभ योग: गलत कार्यों और विचारों (अशुभ योग) को रोकने के लिए अच्छे कार्यों (शुभ योग) का सहारा लें।
मिथ्या दर्शन बनाम सम्यक् दर्शन: गलत धारणाओं को हटाकर सही दृष्टि और सत्य को अपनाने का प्रयास करें।
3. कषायों (विकारों) पर विजय के सूत्र (प्रतिपक्ष भावना): आचार्य प्रवर ने चार मुख्य विकारों को जीतने के लिए उनके विपरीत गुणों को अपनाने की प्रेरणा दी।
क्रोध (गुस्सा) : इसे क्षमा के द्वारा जीतें। प्रतिकूल स्थिति में भी मन, वचन और शरीर से शांत रहें।
मान (अहंकार) : इसे मार्दव (विनम्रता) से जीतें।
माया (छल-कपट) : इसे आर्जव (सरलता) से जीतें। कथनी और करनी में अंतर न रखें।
लोभ (लालच) : इसे संतोष के द्वारा जीतें। दूसरों की सहायता करने और दान देने से संतोष बढ़ता है।
4. इंद्रिय संयम : आत्मा को जीतने के लिए पांचों इंद्रियों (कान, आंख, नाक, जीभ, स्पर्श) पर नियंत्रण अनिवार्य है:
कान (श्रोतेन्द्रिय) : अनुपयोगी बातें न सुनें। केवल भगवत् वाणी और साधना की बातें सुनें और राग-द्वेष से बचें।
जीभ (रसेन्द्रिय): स्वाद के पीछे
न भागें। 'विवाद' के बजाय 'संवाद' पर जोर दें।
आंखें : देखने की शक्ति का संयम रखें और केवल शुभ का दर्शन करें।
मंगल प्रवचन के पश्चात आचार्य
श्री ने उपस्थित चारित्रात्माओं की
विविध जिज्ञासाओं का समाधान भी किया, जिससे उपस्थित श्रावक समाज लाभान्वित हुआ।