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अक्षय तृतीया पर श्रद्धासिक्त विभिन्न कार्यक्रम
युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि मोहजीत कुमार जी के पावन सान्निध्य में स्थानीय तोषनीवाल भवन के प्रांगण में 'अक्षय तृतीया पारणोत्सव' मनाया गया। इस अवसर पर मुनि भव्य कुमार जी ने अपने चतुर्थ वर्षीतप का पारणा किया। साथ ही, उनके संयम जीवन के 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में उन पर आधारित म्यूजिक वीडियो "संयम का सफर ये सुहाना " का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर मुनि मोहजीत कुमार जी ने भगवान ऋषभ के द्वारा विकास की परम्परा एवं वर्षीतप के महत्व पर प्रकाश डाला। मुनिश्री ने कहा जैन परम्परा में अक्षय तृतीया का आध्यात्मिक महत्व प्रथम तीर्थकर भगवान ऋषभ के 400 दिनों की तपस्या के बाद यह दिन पारणे के साथ जुड़ा हुआ है। ऋषभ के अन्तराय कर्म बंधन की मुक्ति प्रपोत्र श्रेयांस के हाथों इक्षु रस के दान से हुई। भगवान ऋषय इस काल खंड के प्रथम भिक्षु, याचक, केवली तीर्थंकर के रूप में प्रतिष्ठित हुए। मुनि भव्य कुमारजी के संयम जीवन के 25वें वसंत की पूर्णता और 25 वर्षों के साहचर्य की अनुभूति के संदर्भ में बोलते हुए मुनि मोहजीत कुमारजी ने कहा— "मुनि भव्य कुमारजी ने सेवा और श्रम के साथ संत जीवन के प्रत्येक कार्य में दक्षता हासिल की है। इन्होंने ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप की वृद्धि के साथ-साथ अपनी मेधा का सक्रिय उपयोग किया है। इन्होंने प्रत्येक परिस्थिति में स्वयं को ढाला है तथा विवेकपूर्ण ढंग से संघ और संघपति की दृष्टि के अनुसार कार्य कर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है। इस अवसर पर मैं उनकी भावी संयम यात्रा के स्वर्णोत्सव के रूप में प्रवर्धमान होने की मंगलकामना करता हूँ। अपने चतुर्थ वर्षीतप की सम्पन्नता पर मुनि भव्य कुमार जी ने भगवान् ऋषभ -इक्षु -श्रेयांस से जुडी प्रेरणा एवं वर्षीतप व 25 वर्षीय संयम जीवन के अनुभव साझा किये। उन्होंने अपने परम उपकारी आचार्य महाप्रज्ञ जी, आचार्य श्री महाश्रमण जी,शासन श्री मुनि सुखलाल जी ,मुनि मोहजीत कुमार जी के प्रति कृतज्ञ स्वर प्रकट किए। मुनि जयेश कुमार जी ने भगवान आदिनाथ के महानतम व्यक्तित्व के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओ पर प्रकाश डालते हुए कहा तीर्थंकर ऋषभ पुरुषार्थ चतुष्टयी के पुरोधा थे। वे अपने युग के प्रथम प्रयोगधर्मा प्रवर थे। मुनि भव्य कुमार जी की वर्धापना करते हुए उन्होंने कहा कि मुनिश्री का दीक्षापूर्व नाम भारत था। भारत का अर्थ भरत द्वारा बसाया हुआ देश है। पर आचार्य महाप्रज्ञ ने उनका नाम भव्य कुमार कर उन्हें किसी की कृति नहीं स्वयं कृतिकार बनने का संदेश दिया ।सिर्फ भाग्यशाली नहीं स्वयं भाग्यविधाता बनने का बोध दिया ।आत्मा से भव्यात्मा व परमात्मा बनने का मार्ग प्रशस्त किया।