धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

श्रुतानुश्रुत कहा जाता है कि एक बार जयाचार्य लाडनूं में विराजमान थे। वे साहित्य रचना कर रहे थे और युवाचार्य मघवा जनता में प्रवचन कर रहे थे। व्याख्यान में वे कुछ स्खलित हो गए। उस समय जयाचार्य का ध्यान उस और चला गया। फिर श्रीमज्जयाचार्य व्याख्यान में पधारे। व्याख्यान में स्खलित होने के लिए युवाचार्य मघवा को उलाहना दिया। श्री मघवा ने विनम्रता से उलाहना स्वीकारा। जनता इस दृश्य को देख स्तब्ध थी। दूसरे दिन अनुशासन के सूत्रधार जयाचार्य ने गत दिवस के प्रसंग को उद्धत करते हुए मघवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की मानो कि इस प्रसंग से उन्होंने सबको एक बोध-पाठ सिखाया कि विनम्रता से गुरू की डॉट को स्वीकारना चाहिए। परानुशासन की तब तक उपयोगिता होती है जब तक व्यक्ति का आत्मानुशासन नहीं जागता। आत्मानुशासन जगने के बाद परानुशासन कृत-कृत्य हो जाता है।
अनुशासन वहां अपेक्षित है जहां संवेगों पर अनियन्त्रण होता है, कषाय की प्रबलता होती है, इच्छा का सीमाकरण नहीं होता। इस स्थिति में जो बड़ों के अनुशासन के सहारे चलता है, वह विकास की उच्च भूमिका पर आरूढ़ हो सकता है। मर्यादा-महोत्सव हर वर्ष अनुशासन की प्रेरणा देता रहे और उसके आलोक में दुनिया का पथ प्रशस्त होता रहे।
दीक्षा
जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक आत्मा का स्वतंत्र एवं त्रैकालिक अस्तित्व है। वह सदा थी, है और रहेगी। कोई आत्मा किसी परम सत्ता के अधीनस्थ नहीं है। आत्मा अपने कृत कर्मो के अनुसार स्वयं सुख-दुःख का अनुभव करती है, जन्म-मरण के चक्र में घूमती रहती है। आत्मा में क्रोध, अभिमान, माया और लोभ के संस्कार जितने-जितने पुष्ट होते हैं उतना-उतना दुःख बढ़ता है, सुख घटता है। ये संस्कार जितने-जितने क्षीण होते हैं। उतना-उतना सुख बढ़ता है, दुःख घटता है।
सम्राट श्रेणिक महात्मा बुद्ध के दर्शनार्थ गया। वन्दन कर वह बुद्ध के समीप बैठ गया। उसने बुद्ध के पास बैठे भिक्षुओं को देखा। उनके चेहरे प्रसन्नता बिखेर रहे थे। यह देख राजा चिंतन की गहराई में डूब गया। उसके मन में एक जिज्ञासा जन्मी। ये भिक्षु जिन्हें न पूरा भोजन मिलता है और न पानी। जमीन ही इनकी शय्या है, और भी नाना प्रकार के कष्टों से परिपूर्ण है इनका जीवन। फिर भी ये कितने प्रसन्न हैं? दूसरी और मेरे राजकुमार, जिन्हें सब प्रकार की भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त हैं, फिर भी वह प्रसन्नता उनके चेहरों से नहीं टपकती। क्या राज है इसका? बहुत सोचा पर राजा को समाधान नहीं मिला। समाधान था बुद्ध के पास। राजा ने बुद्ध से पुछा तो उन्होंने कहा-राजन्! प्रसन्नता का सम्बन्ध भौतिक सुख-सुविधा से नहीं, निस्पृहता और समता से है। मेरे भिक्षु अध्यात्म का जीवन जीते हैं। इन्होंने वर्तमान में जीना सीख लिया है। भूत, भविष्य की स्मृति और कल्पनाओं की उधेड़बुन से मुक्त रहकर ये वर्तमान-द्रष्टा बन गये हैं। इसलिए ये अनवरत सहज प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।
तुम्हारे राजकुमार सुख-सुविधा का जीवन जी सकते हैं पर शान्ति का नहीं। क्योंकि वे आकांक्षाओं को पाले हुए हैं। वे भूत-भविष्य में जीना जानते हैं, पर वर्तमान में जीना पूरा नहीं जानते।
हर प्राणी सुखी बनना चाहता है। सुख दो प्रकार का होता है- पदार्थ-जनित सुख और आत्मिक सुख। पदार्थ-जनित सुख स्थायी नहीं होता, वह विनाशशील होता है, क्योंकि वह पराश्रित एवं परापेक्ष सुख है। मनोज्ञ पदार्थ का संयोग जब तक है, तब तक उसका अस्तित्व है। ज्योंही उस पदार्थ का संयोग मिटा, वह सुख भी मिट जाता है।
अध्यात्म-साधना का बहुत बड़ा सूत्र है वर्तमान में जीना। वर्तमान-जीवी साधक के कषाय प्रतुन हो जाते हैं। उसके क्रोध, अहं, लोभ आदि विकार कृश हो जाते हैं। वर्तमान में जीने वाला व्यक्ति निर्विचारता के निकट पहुंच सकता है। निर्विचारता की स्थिति में भीतरी आनन्द प्रस्फुटित होता है। आत्मिक सुख स्वाश्रित एवं स्वापेक्ष होता है। वह पदार्थ पर निर्भर नहीं होता। आत्मा का अपने आप से कभी वियोग नहीं होता, इसलिए आत्मिक सुख स्थायी एवं अविनाशी होता है।
आध्यात्मिक विकास और क्षमता के विकास के लिए हम अनपेक्षित स्मृति और कल्पना से बचकर वर्तमान में जीना सीखें, भावक्रिया का अभ्यास करें, यह श्रेयस्कर है। उसके लिए अपेक्षा है अपनी इन्द्रियों और मन पर नियंत्रण पाने को। भोग से त्याग की ओर मुड़ने की।