श्रमण महावीर

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

महावीर के दर्शन में अनन्त परमाणु हैं और अनन्त आत्माएं। प्रत्येक परमाणु और प्रत्येक आत्मा बिम्ब है। हर बिम्ब का अपना-अपना प्रतिबिम्ब है। गुण का स्थायीभाव बिम्ब है और उसकी गतिशीलता प्रतिबिम्ब है।
महावीर ने इस दर्शन की भूमि में साधना का बीज बोया। अचेतन के सामने साधना का कोई प्रश्न नहीं है। उसका होना और गतिशील होना-दोनों प्राकृतिक नियम से जुड़ा हुआ है किन्तु उसकी गतिशीलता प्राकृतिक नियम से संचालित नहीं होती। वह ज्ञानपूर्वक बदलता है-जो होना चाहता है उस दिशा में प्रयाण करता है। यही है उसकी साधना। मनुष्य का ज्ञान विकसित होता है इसलिए वह विकास के चरम-बिन्दु पर पहुंचना चाहता है। उसके सामने चेतना की दो भूमिकाएं हैं-एक द्वन्द्व की और दूसरी द्वन्द्वातीत। जीवन और मृत्यु, सुख और दुःख, मान और अपमान, हर्ष और विषाद जैसे असंख्य द्वन्द्व हैं। ये मन पर आघात करते रहते हैं। उसमें मन का संतुलन बिगड़ जाता है। वह विषम हो जाता है।
द्वन्द्व के आघात से बचने के लिए महावीर ने समता की साधना प्रस्तुत की। उनके द्वारा प्रतिपादित धर्म का नाम है- समता धर्म, सामायिक धर्म। इसके दो अर्थ हैं-
१. प्राणी-प्राणी के बीच में समता की खोज और अनुभूति ।
२. द्वन्द्वों के दोनों तटों के बीच में मानसिक समता के पुल का निर्माण।
समता का विकास मैत्री, अभय और सहिष्णुता-इन तीन आयामों में होता है। जिस व्यक्ति में प्रतिकूल परिस्थिति को सहन करने की क्षमता जागृत नहीं होती, वह अभय नहीं हो सकता और भयभीत मनुष्य में मैत्री का विकास नहीं हो सकता। जिसमें अनुकूल परिस्थिति को सहन करने की क्षमता जागृत नहीं होती, वह गर्व से उन्मत्त होकर दूसरों में भय और अमैत्री का संचार करता है। तीनों आयामों में विकास करने पर ही समता स्थायी होती है।
समता एक आयाम में विकसित नहीं होती। यह होता है कि हम किसी व्यक्ति को मैत्री के आयाम में अधिक गतिशील देखते हैं, किसी को अभय के आयाम में और किसी को सहिष्णुता के आयाम में। इनमें से एक के होने पर शेष दो का होना अनिवार्य है। समता के होने पर इन तीनों का होना अनिवार्य है। इन तीनों का होना ही वास्तव में समता का होना है।
१. मैत्री का आयाम
कालसौकरिक राजगृह का सबसे बड़ा कसाई था। उसके कसाईखाने में प्रतिदिन सैकड़ों भैंसे मारे जाते थे। एक दिन सम्राट श्रेणिक ने कहा, कालसौकरिक!
तुम भैंसों को मारना छोड़ दो। मैं तुम्हें प्रचुर धन दूंगा।'
कालसौकरिक को सम्राट् का प्रस्ताव पसन्द नहीं आया। भैंसों को मारना अब उसका धन्धा ही नहीं रहा, वह एक संस्कार बन गया। उन्हें मारे बिना कालसौकरिक को दिन सूना सूना-सा लगता। उसने सम्राट् के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। सम्राट् ने इसे अपना अनादर मान कालसौकरिक को अन्धकूप में डलवा दिया। एक दिन-रात वहीं रखा।
श्रेणिक ने भगवान् महावीर से निवेदन किया- 'भंते! मैंने कालसौकरिक से भैंसे मारने छुड़वा दिए हैं।'
'श्रेणिक ! यह सम्भव नहीं हैं।'
'भंते! वह अन्धकूप में पड़ा है। वह भैंसों को कहां से मारेगा?'
'उसका हृदय-परिवर्तन नहीं हुआ है, फिर वह अपने प्रगाढ़ संस्कार को दंड-बल से कैसे छोड़ सकेगा?'
'तो क्या भगवान् यह कहते हैं कि उसने अन्धकूप में भी भैंसों को मारा है?'
'हां, मेरा आशय यही है।'
'भंते! यह कैसे सम्भव है?'
'क्या उस अन्धकूप में गीली मिट्टी नहीं है?'