स्वाध्याय
संबोधि
स्वभाव की खोज में उत्सुक साधक को इन दोनों असद् ध्यानों से सतत सावधान रहना चाहिए। उसे यह जान लेना चाहिए कि ये आत्म-प्रगति में किसी तरह साधक नहीं, बाधक हैं। अपनी वृत्तियों पर सतत प्रहरी बनकर निरीक्षण करते रहना साधक का परम धर्म है। जैसे विचार करते हो वैसा ही बन जाते हो। विश्व का नियम है, जो जैसा सोचता है, करता है, बोलता है वह सब लौटकर पुनः उसमें ही प्रविष्ट हो जाता है। सब गति वर्तुलाकार है। इसलिए सन्तों ने सब तरह से मनुष्य को सावधान करने का प्रयास किया है। तुम अपने भाग्य के निर्माता हो। तुम अपनी क्रिया के प्रति जागरूक बनो। ऐसा कोई आचरण, व्यवहार मत करो जो अंततः तुम्हारी ही गर्दन काटने वाला हो।
प्रशस्त ध्यान है-धर्म और शुक्ल । अप्रशस्त से मुक्त होने का अर्थ है प्रशस्त का द्वार खोलना। प्रशस्त खुला है, अनावृत है। आवरण है तो अप्रशस्त का है। जैसे ही व्यक्ति उसे छोड़ता है, प्रशस्त प्रगट हो जाता है। अप्रशस्तता अस्वाभाविक है, वह आगन्तुक है। अतिथि नियतवास कैसे कर सकता है ? किन्तु यह सब सम्भव है जब हमें यह पता हो कि यह अतिथि है या शरण्य है। हम यदि उसे अपना ही मान लेते हैं तब असंभव है। प्रशस्त सहज है, स्वाभाविक है स्वास्थ्य की भांति।
अपने घर में आना धर्म है। यात्रा का मुख स्रोत के अभिमुख होता है तब केन्द्र पर पहुंचा जाता है। चेतना का चेतना में लौट आना धर्म का परम पवित्र और सर्वोत्तम पद है। 'अप्पा अप्पम्मि रओ' आत्मा में रमण करना-यह शुक्ल-ध्यान का अंतिम चरण है। यात्रा की यहां समाप्ति हो जाती है। किन्तु यह सहज प्राप्य नहीं है। इसलिए आचार्यों ने कहा-साधक स्थूल से सूक्ष्म और अलक्ष्य से लक्ष्य की दिशा में अग्रसर हो, सालंबन और निरालंबन के विभाजन का यही कारण है।
सालम्ब ध्यान में ध्याता और ध्येय का द्वैत बना रहता है। जो आलंबन है ध्याता उस पर अपने चित्त को एकाग्र करता है। विकेन्द्रित मन को सब ओर से समेट कर एक दिशामुखी बना लेना ही इसका कार्य है। जब मन इसमें निष्णात हो जाता है तब निर्विचार, विचारशून्य-अमन No Miud की दिशा में कठिनाई नहीं होती। इसलिए इसका पूर्वाभ्यास सामान्य साधकों की स्थिति को दृष्टिगत रखकर उपयोगी समझा है। इनके अनेक भेद हो सकते हैं। साधारण तथा ध्यान-साधकों ने ध्यान को चार भागों में विभक्त किया है-
(१) पिण्डस्थ ध्यान
(३) रूपस्थ ध्यान
(२) पदस्थ ध्यान
(४) रूपातीत ध्यान
(१) पिण्डस्थ ध्यान
पिंड का अर्थ है-शरीर।
शरीर के विविध अव्यवों को केन्द्र बनाकर चित्त को एकाग्र करना पिंडस्थ ध्यान है। पिण्डस्थ-पिंड में स्थित होना। शरीर बहुत स्थूल है। शरीर से हमारा परिचय भी बहुत है और यह भी कहा जा सकता है, बहुत कम लोग शरीर से सम्यक् परिचित
होंगे। शरीरशास्त्रियों से भी वह अब तक पूर्णतया विज्ञात नहीं हुआ है और हो सकेगा इसमें भी संदेह है। योगियों ने अपने आंतरिक स्थिरीकरण और अनुभवों से जैसा उसे जाना है वह उन लोगों के लिए अति आश्चर्यजनक है। किन्तु हमें यहां स्थूल और सूक्ष्म विज्ञात और अविज्ञात दोनों ही आलंबनो और उसके परिणामों पर ध्यान देना है। स्थूल दृष्टि से केन्द्रीकरण के माध्यम हैं (१) सिर (२) भ्रू (३) तालु (४) ललाट (५) मुंह (६) नेत्र (७) कान (८) नासाग्र (९) हृदय (१०) नाभि। कुछ अन्य स्थानों का निर्देश भी मिलता है जैसे कंठकूप, जिह्वाग्र, जिह्वामूल जिह्वामध्य, 'त' के उच्चारण का स्थान मेरुदंड आदि।