रचनाएं
महाश्रमण महिमा : तीन दिव्य दिवस
दीक्षा दिवस की स्वर्णिम बेला, छाया है भक्ति का रंग।
आनंद उत्सव आया है, गुरु चरणों में रम जाएँ हम।।
दिव्य रूप में जन्म लिया, हो गई धन्य वसुंधरा पावन।
आलोकित हुई सारी दिशाएं, जब पुण्य पुंज बन आया,
नेमा नंदन।।
छोटी वय में ही पाया, जग की नश्वरता का ज्ञान।
अन्तर्मन का द्वार खुला, हुआ दीक्षा का आह्वान।।
तुलसी, महाप्रज्ञ की मिली प्रेरणा, शुभ कर्मों का संयोग बना।
आत्मा की उज्जवल आभा से, गुरु बन गये दीर्घमना।।
ढोल नगाड़े जयकारों से, धरती अंबर गूंज उठे।
फलित पुण्य हो गया संघ का, गुरु महाश्रमण गणराज बनें।।
मिट गया तिमिर जगत का, माटी भी बन गई चन्दन।
पतझड़ में मधुमास बने तुम, भर दिया प्राणों में स्पंदन।।
वंदन उस सौम्य दृष्टि को, जिसमें बहती करुणा की धार।
मुख मंडल पर तेज अनूठा, जो है जिन शासन का श्रृंगार।।
चेहरे पर मुस्कान मनोहर, श्वेत वेश में उजला दर्पण।
अरिहंतों की राह पर चलते, मोक्ष मार्ग के राही बन।।
संघ पति के श्री चरणों में, है मेरा सर्वस्व समर्पण।
दीक्षा दिवस की स्वर्णिम बेला, छाया है भक्ति का रंग।।
आनंद उत्सव आया है, गुरु चरणों में रम जाएँ हम।
जय जय गुरु महाश्रमण, जय जय गुरु महाश्रमण।।