रचनाएं
योगक्षेम वर्ष को मना रहे
धर्मसंघ के योगक्षेम कर्ता प्रभुवर,
योगक्षेम वर्ष सफलतम मना रहें।
योगक्षेम वर्ष के निमित से गणपति,
धर्मसंघ की नींव गहरी बना रहें।
दूरदर्शिता, सरलता, ज्ञान गंभीरता,
आध्यात्मिकता में डुबकी लगा रहें।
आचार उज्ज्वल बने प्राथमिकता,
जीवंतता से सबको ये सिखला रहें।
व्यवहार कुशलता कर्तव्य हमारा,
बोध जागरूकता से हमेशा बना रहें।
अनमोल निधि है संस्कार हमारे,
पल पल स्मृति में भाव ये जगा रहें।
अर्हत् वाणी है सदैव कल्याणी,
उसका मधुर रसपान करवा रहें।
पापभीरुता रहे जीवन में हर पल,
स्वयं सजग बनकर दिखला रहें।
करें संयम साधना आत्म आराधना,
जिससे प्रज्ञा दीप हर घट जलता रहें।
प्रवचन गुरुवर का प्रश्न हमारा,
समाधान से आत्मतृप्ति दिला रहें।
आत्मार्थी, पुरुषार्थी, कुशल सारथी,
विविधता से जीवन को संवार रहें।
संघ पुरुष रहेगा सदैव चिरायु,
संघ की बागडोर आप संभाल रहें।
अणु-प्रेक्षा, जीवन-तेरापंथ-तत्त्वदर्शन,
का लाडनूं में सिंचन कर रहें।
प्रशिक्षण सिंचन से प्रभु का पंथ,
सतत प्रगति पथ पर बढ़ता रहें।
'कुमुद' जाए बलिहारी भिक्षु गण की,
नन्दन वन सा गण महकता रहें।