रचनाएं
परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी द्वारा रचित गीत
अध्यात्म की शरण में सुखवास हम करते रहें।
सद्भक्ति में संलीन बन संबोध निधि भरते रहें।।
प्रज्ञा जगे हमारी परम की संप्राप्ति हो।
संकल्प बल प्रबल हो दुर्भावगण मरते रहें।।१।।
सद्ध्यान की विधा को विभु ने किया उजागर।
समता रहे निरंतर दुर्गुण निकर गरते रहें।।२।।
संन्यास की डगर पर हो चरणविन्यास वर।
गहरी जगे मुमुक्षा भवसिंधु को तरते रहें।।३।।
गुरु वार्षिकी दिन षोडश लाडनूं पुर जै.वि.भा.।
सन्मार्ग पर सना सब मजबूत पग धरते रहें।।४।।
प्रभु महाप्रज्ञ को प्रतिपल प्रवर श्रद्धामय नमन।
जय जय 'महाश्रमण' हो प्रभुवर्य को स्मरते रहें।।५।।
लय- उठ जाग रे मुसाफिर ....