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उन्नयन के तीन चरण- तीन गुरु की मिली शरण
महान दार्शनिक सुकरात से किसी ने पूछा- मनुष्य उन्नति करना चाहे तो उसे क्या करना चाहिए? प्रत्युत्तर में सुकरात ने पांच बिंदु बताये-
अपना सामान्य दायरा बढ़ाओ (स्वार्थ छोड़ो)।
संतोष धारण करो - संतोष से शांति और शांति से प्रसन्नता बढ़ती है।
दूसरों के दोष देखने में अपनी शक्ति का अपव्यय मत करो।
कठिनाइयों को देखकर भयभीत नहीं होना।
●हर किसी में जो अच्छाई हो उसे स्वीकार कर अपना ज्ञान और उमंग बढ़ाना।
सुकरात द्वारा प्रदत्त उपरोक्त पांच बिंदु परमार्थ, समता, गुणानुराग, साहस और अनुभव प्रौढ़ता का संकेत दे रहे हैं। जब मैं वर्तमान साध्वी प्रमुखा श्री विभूति नेत्री के जीवन कौशल व उन्नयन को देखती हूं तो मुझे लगता है ये पांचों बिंदु आपकी चेतना में पय मिश्री बन रमे हुए हैं। आपका जीवन अनेक दृष्टियों से प्रेरणास्रोत है। गरिमापूर्ण दायित्व का निष्ठापूर्वक वहन आपकी साधना की प्रखरता को मुखर कर रहा है। आपकी आभामंडलीय ऊर्जा व अदम्य उत्साह को उन्नयन के तीन चरण : तीन गुरु की मिली शरण के रूप में देखा जा सकता है।
तुलसीयुग - समण दीक्षा (समणी नियोजिका)
महाप्रज्ञ युग - मुख्य नियोजिका
महाश्रमण युग - साध्वी प्रमुखा
तुलसी युग - समण दीक्षा (समणी नियोजिका)
आचार्य श्री तुलसी एक क्रांतिकारी आचार्य थे। उन्होंने अपने युग में अन्यान्य क्रांतियों के साथ समण दीक्षा का भी एक क्रांतिकारी कदम उठाया। जिनके प्रारंभिक बैच में प्रतिभाशाली मुमुक्षु बहनों को समण दीक्षा प्रदान की। श्रद्धेया साध्वी प्रमुखा श्रीजी को उस प्रथम बैच में समण दीक्षा लेने का व प्रथम समणी बनने का गौरव प्राप्त हुआ। मोदी कुल की उज्ज्वल ज्योति, चंदेरी की दिव्य विभूति, गुरु तुलसी महायज्ञ की महनीय कृति बनी समण श्रेणि का पहला मोती। 'सद्गुण ही ज्ञान है और ज्ञान ही सद्गुण है' विद्वानों की यह उक्ति उस समय भी आपके दायित्व एवं कर्तृत्व को ऊंचाइयां प्रदान कर रही थी। आपकी प्रखर साधना, स्वाध्यायशीलता, ज्ञान की गहनता, विनययुक्त व्यवहार, मधुरभाषिता, संघनिष्ठा व कर्तव्यनिष्ठा आदि विविध विशेषताओं का मूल्यांकन करते हुए आपको समणी नियोजिका पद पर प्रतिष्ठित किया गया। आपके गुरुदेव की तपस्या में, अपनी ज्ञान गरिमा, आचार्य निष्ठा, साधना निष्ठा व अनुशासन को प्राप्त करने पर की गई गरिमामयी घोषणा का कार्य उसे आपके देश-विदेश में सेवा की प्रमाणपत्र को मुखर किया। इस प्रकार आप प्रथम समणी नियोजिका बनी।
महाप्रज्ञ युग : मुख्य नियोजिका
व्यक्तिगत विकास के पांच गुण हैं:
सामने वाले की बात को धैर्यपूर्वक सुनना और अपनी बात को धैर्यपूर्वक समझाना।
आवश्यकतानुसार प्रत्युत्तर देना या न देना।
●व्यर्थ की बहस में न पड़ना।
●किसी का अनावश्यक विरोध न करना।
●कम बोलना, मुनासिब बोलना।
मैंने श्रद्धेया साध्वी प्रमुखाश्रीजी को साध्वी नियोजिका, मुख्य नियोजिका और साध्वी प्रमुखा - तीनों रूपों में देखा है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये पांचों गुण उन्होंने कम उम्र से ही आत्मसात किए हुए हैं। सादगी, सुदृढ़ आचार और मधुर व्यवहार से उन्होंने अपने जीवन को सुंदर बनाया है। समय का नियोजन व सदुपयोग तथा वर्तमान में जीने वाला ही आगे बढ़ने का अभिलेख लिख सकता है। समय का नियोजन जीवन यात्रा को सार्थक तथा सकारात्मक बनाने में सहायक होता है। सकारात्मक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति सदा विकसित कमल की तरह होता है। वह सबको प्रिय लगता है। अपनी इन विशेषताओं के कारण सौम्यता, सरलता, मुग्धता आदि भाव उनके चेहरे पर सदा दिखाई देते हैं। उन्होंने कवि की निम्नलिखित पंक्तियों को साकार कर दिखलाया-
वक्ता से लड़कर जो नसीब बदल दे,
इंसान वही जो अपनी तस्वीर बदल दे॥
आपके आचार की पवित्रता, चारित्र की उज्ज्वलता, श्रमशीलता, गुरु के प्रति समर्पण भाव, अध्यात्मनिष्ठा इत्यादि महान गुणों का मूल्यांकन करते हुए श्री महाप्रज्ञ जी ने आपको मुख्य नियोजिका पद से अलंकृत करके आपको संघ में दूसरे स्थान पर प्रतिष्ठित कर दिया। आप तेरापंथ धर्म संघ के आज तक के इतिहास में मुख्य नियोजिका बनने वाली एकमात्र साध्वी प्रमुखा हैं।
महाश्रमण युग : साध्वी प्रमुखा
शिवखेड़ा ने अपनी पुस्तक 'यू कैन विन' (आप जीत सकते हैं) में लिखा है कि सफल लोग विशिष्ट काम नहीं करते, वे काम को विशिष्ट ढंग से करते हैं। साध्वी प्रमुखा जी की भी काम करने की अपनी शैली है। शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की कलाओं के समान प्रवर्धमान आपका जीवन साधना और शिक्षा दोनों दृष्टियों से परिपक्व है। आपका खाद्य संयम अनूठा है। आप महीनों से ज्यादा द्रव्य उपवास करती हैं। वर्षों के लंबे उपवास का प्रत्यावर्तन तथा दीक्षा के कुछ समय बाद से आपने आजीवन मियान रखा है। आप बहुत कम सोती हैं। निद्रा संयम, इंद्रिय संयम, वाणी संयम, और खाद्य संयम बेजोड़ हैं। प्रभावशाली प्रवचन शैली, महाप्रज्ञ वाङ्मय, आगम सम्पादन, अराप्रज्ञ प्रबोध आदि का सृजन हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, प्राकृत, राजस्थानी आदि अनेक भाषाओं का ज्ञान आपके व्यक्तित्व को अमाप ऊंचाइयां प्रदान कर रहा है। आपने तीन-तीन आचार्यों की कृपा से कर्तृत्व के अनमोल अवसर प्राप्त कर अपने व्यक्तित्व को प्रभावित बनाया। वर्षों तक शासन माता असाधारण साध्वी प्रमुखा श्री महाश्रमणीजी के पास अपने अनुभवों की संपदा को बढ़ाया। गुरु दृष्टि के प्रति जागरूकता आदि गुणों का अवलोकन करते हुए परमपूज्य, महातपस्वी, मुनिप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी ने आपको साध्वी प्रमुखा जैसे गौरवान्वित पद पर अभिषिक्त कर दिया। संघ निष्ठा, गुरु निष्ठा, आज्ञा निष्ठा ने आपको सदैव संघ के सम्मानित पदों पर काम करने का अवसर दिया है। आपका तेजस्वी व्यक्तित्व, वर्चस्वी कर्तृत्व एवं कुशल नेतृत्व पूरे साध्वी समाज को नई-नई दिशाएं प्रदान कर रहा है।
सन् 2025 भायंदर से बैंग्लोर जाते समय मार्ग में अचानक मेरे आंखों के आसपास हर्पिस हो गई। आपश्री को जानकारी मिलते ही तत्काल उपशम संदेश दिलवाया शीतलनाथ की गीतिका स्वाध्याय की प्रेरणा दी। संदेश पढ़कर ऐसा लगा मानो तकलीफ मेरे है और वेदना आप महसूस कर रहे हैं। शीतलनाथ की गीतिका बहुत समाधि और शांति का अनुभव हुआ। इस प्रकार निकटस्थ, दूरस्थ, धर्मसंघ की हर साध्वी की समाधिपूर्ण साधना के लिए अपनी वात्सल्यमयी निगाहों से हर पल आप पोषण देती रहती हैं।
आप इसी तरह साध्वी समाज के योगक्षेम की सतत संवाहिका बनी रहें। योगक्षेम वर्ष का स्वर्णिम अवसर विशाल धर्मसंघ की उपस्थिति, साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभाजी का पांचवां चयन दिवस, काश! ऐसे महनीय पलों में सहभागी बनने का सौभाग्य हमें भी उपलब्ध होता। मनोनयन दिवस पर शतशः बधाइयां, मंगलकामनाएं।