रचनाएं
प्रभो! नित्य नये रास रचाएं, मन पंछी आना चाहे
पट्टोत्सव आज मनाएं, मन पंछी आना चाहे।
'प्रभो! नित्य नये रास रचाएं। मन पंछी आना चाहे।'
मौसम है खुशनुमा, हवाएं गीत गुनगुनाएं,
कुदरत के कारीगर, नूतन रंग खिलाएं।
चाँद सितारे, नक्षत्र सारे, गा रहे संगान।।
छोटी वय में प्रभुवर, संयम रत्न पाया।
गंभीर शौर्य तेरा, तुलसी मन भाया।
बन गए महाप्रज्ञ के पट्टधर, तारण - तरन जहान।।
सुसज्जित चंदेरी, अमल धवल अलबेली,
आम बांटेंगे विभूवर! गुड़ की रसभेली।
प्रतिमा का रूप हमें दो, बने संघ की शान।।
करुणा की कोमल फसलें, लहर-लहर लहराती,
क्षमा मूर्ति आर्जव मार्दव, के रंग रंग जाती।
पल-पल अरुणोदय जीवन में, हमारे हो उत्थान।।
युगों-युगों आलोक बिखेरो, यूंही गाए विरुदावली,
श्रम की गाथा सुन, रोमांचित होती रोमावली।
सेवा श्रम सिंगार बने, हमें दो ऐसा वरदान।।