संयम और तप के अद्वितीय  सूर्य : आचार्य श्री महाश्रमण

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साध्वी अमितरेखा

संयम और तप के अद्वितीय सूर्य : आचार्य श्री महाश्रमण

अध्यात्म के सुमेरु आचार्यवर तीर्थंकर के प्रतिनिधि के रूप में जैन शासन के साथ मानव जाति का पथ-दर्शन करवा रहे हैं। तेरापंथ धर्मशासन के आचार्य अतिशय संपन्न व्यक्तित्व के धनी होते हैं। अनुशासन, समर्पण और अप्रमत्तता से निरंतर प्रवर्धमान होते हुए संघ को शिखरों पर चढ़ा रहे हैं।
भैक्षवगण एकादशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमणजी की साधना अनुत्तर है। संयम और तप के अद्वितीय सौंदर्य से आपका रूप नव सुषमा को बिखेरता हुआ निखरता जा रहा है। चेहरे की मधुर मुस्कान और आँखों में वात्सल्य रस, निर्झर की तरह अमृत रस वर्षा रहा है। ब्रह्मचर्य के स्वाभाविक तेज से आपका भव्य ललाट बाल सूर्य की तरह चमक रहा है। समुद्र के समान गंभीरता, मेरु के समान अडोलता, सूर्य के समान तेजस्विता, चंद्रमा के समान शीतलता और पृथ्वी के समान सहनशीलता आदि गुणों से आपका जीवन विशिष्ट है।
ओजस्विनी वाणी और मधुर स्वर लहरी के साथ सारगर्भित प्रवचन जन-जन को चुम्बक की तरह आकृष्ट कर रहे हैं। महातपस्वी गुरुदेव के जीवन में अनगिन सद्गुण समाहित होकर तीर्थंकर के अतिशय का सबूत दे रहे हैं। शास्त्रों में आचार्य की आठ संपदा बतलाई गई है, और ये आठों संपदाएं आपके जीवन में उत्तरोत्तर वृद्धिंगत हो रही हैं। अनुयोग द्वार के 13वें प्रकरण में बताया गया है–
जह दीवा हीवसय, पप्पए सोय दिप्पए ही वो।
दीप समा आयरिया, हिप्पनि परं च दीवेंति॥
आचार्य को दीपक की उपमा दी गई है। जिस प्रकार एक दीपक से सहस्रों दीपक जल उठते हैं, वैसे ही आचार्य ज्ञान संपन्न होते हुए अपने शिष्यों को निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। महाप्रभावक, महायशस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली है कि उनके मधुर प्रेरक प्रसंगों की थाह पाना कठिन है।
एक प्रेरक संस्मरण :
वि. सं. 2056 (सन् 2000), तारानगर मर्यादा महोत्सव का प्रसंग था। श्रद्धास्पद महायोगी आचार्य श्री महाप्रज्ञजी की सुखद सन्निधि प्राप्त थी। प्रातः सूर्योदय के साथ ही हम साध्वियां, साध्वी प्रमुखा श्रीजी के साथ गुरु सन्निधि में पहुंचती थीं। एक दिन हम कुछ साध्वियां विलंब से पहुंचीं, तब तक आचार्यवर कक्ष में पधार चुके थे और साध्वी प्रमुखा श्रीजी भी अपने गंतव्य की ओर जा चुकी थीं।
मेरे भीतर बेचैनी थी कि अब पूज्यप्रवर के दर्शन कैसे होंगे। हमने बाहर से आचार्यवर को वंदना की और फिर युवाचार्य प्रवर (वर्तमान आचार्य महाश्रमणजी) के कक्ष में गईं। वहाँ हम चार साध्वियां थीं: साध्वी श्री वर्धमानश्रीजी, अमितरेखा, राजश्रीजी और संवरयशाजी।
युवाचार्यवर ने हमसे प्रश्न किया— 'तीर्थंकरों का रंग कौन सा है?'
मुझे छोड़कर सभी एक-दूसरे को देखने लगीं। किसी को उत्तर देते न देख मैंने निवेदन किया— 'भन्ते! दो सफेद, दो लाल (लाख), दो हरे, दो काले और शेष सोलह तीर्थंकरों का रंग पीला है'।
युवाचार्यवर ने हमें बोध देते हुए नाम-माला की यह गाथा अर्थ सहित मुखस्थ करवाई–
रक्तौ च पद्मप्रभवासुपूज्यौ, शुक्लौ तु चन्द्रप्रभपुष्पदन्तौ।
कृष्णा पुनर्नेमिमुनी विनीलौ श्री मल्लिपाश्र्वौ कनकत्विषोऽन्ये॥
युवाचार्यवर का यह अनुग्रह पाकर हमें अत्यधिक प्रसन्नता हुई। भले ही हम उस दिन देरी से पहुंची थीं, लेकिन हमें प्रेरणा और ज्ञान का नया 'डोज' प्राप्त हो गया।
ऐतिहासिक उपलब्धियां :
आचार्य श्री महाश्रमणजी ने उत्तरदायित्व संभालते ही केलवा चातुर्मास और आमेट मर्यादा महोत्सव का भव्य आयोजन किया। जसोल की धरती पर हुआ 'इतिहास दुर्लभ सिद्ध चातुर्मास' भक्तों की स्मृतियों में यादगार बन गया है।
इतिहास के झरोखों से देखें तो–
आचार्य श्री कालूगणी : वि. सं. 1979, बीकानेर चातुर्मास में एक साथ 13 दीक्षाएं दीं।
आचार्य श्री तुलसी: वि. सं. 1994, बीकानेर चातुर्मास में एक साथ 22 दीक्षाएं प्रदान कर कीर्तिमान रचा।
आचार्य श्री महाश्रमणजी : तुलसी जन्म शताब्दी वर्ष में संकल्प किया और बीदासर में एक साथ 43 दीक्षाएं देकर नया कीर्तिमान स्थापित किया।
आचार्यश्री ने अनशनरत साध्वियों और वृद्धावस्था में संयम के इच्छुक भाई-बहनों की भावनाओं को भी पूरा किया है।
अविराम पदयात्रा और विनम्रता
इस भौतिक युग में संयम का संदेश देने के लिए उन्होंने मेवाड़, मरुधर, कच्छ और गुजरात की कठिन यात्राएं कीं। वे नेपाल और भूटान जैसे विदेशी क्षेत्रों तक भी पहुंचे, जहाँ पहले किसी आचार्य के चरण नहीं पड़े थे।
वर्तमान में (वि. सं. 2082-83) लाडनूं, जैन विश्वभारती की धरा पर 'योगक्षेम वर्ष' के प्रसंग पर आपके प्रेरणादायी प्रवचन सुनकर चित्त को आह्लाद मिलता है।
इसके बाद दिल्ली, पंजाब और हरियाणा की यात्रा घोषित है।
आपकी विनम्रता भी प्रशंसनीय है। 48 कि.मी. के लंबे विहार के बाद जिस प्रकार आपने शासन माता को वंदना की, वह दृश्य हर किसी को आश्चर्यचकित करने वाला था। आचार्य शिवमुनि महाराज ने भी विनम्रता की विशेष सराहना की है।
अभ्यर्थना :
एकादशवें आचार्य श्री महाश्रमणजी के 17वें पदाभिषेक अवसर पर यही अभ्यर्थना है जैसा कि 'रायपसेणिय सूत्र' में सूर्याभदेव के अभिषेक के समय कहा गया है:–
जय-जय नंदा! जय-जय भद्दा! महंते अजियं जिणाहि..
इंदो इव देवाणं, चंदो इव ताराणं...
प्रभो! आप युगों-युगों तक मानव जाति का पथ प्रदर्शन करते रहें। तेरापंथ धर्मसंघ के हर सदस्य की प्रज्ञा जागृत हो और आत्मा ऊर्ध्वमुखी हो। प्रयोगधर्मा आचार्य के श्री चरणों में श्रद्धासिक्त वंदना।
तुम जीओ वर्ष हजार,
हर वर्ष के दिन हों पचास हजार।