रचनाएं
‘देवाधिदेव भी तुम ही हो’
‘देवाधिदेव भी तुम ही हो’
हर-हर शंकर, हर-हर शम्भू, महाश्रमण प्रभु तुम ही हो।
ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रभु तुम, देवाधिदेव भी तुम ही हो।
तेरापंथ के तारणहारे, भिक्षुगण रखवारे हो।
जिनशासन के ध्रुवतारे तुम, दुगड़ कुल उजियारे हो।
पुरुषोत्तम-श्रमणोत्तम प्रभुवर, बोहिदयाणं तुम ही हो।
तीन त्रिलोकीनाथ प्रभु तुम, तेरी क्या महिमा गाएं।
वीतराग-सी मुख-मुद्रा प्रभु महाश्रमण हर मन भाए।
आनंद-घन बरसाओ प्रभुवर, आनंददायी तुम ही हो।
रहनुमा तेरी रहमत से, धर्मसंघ में है आनंद।
कुशल शासना तेरी पाकर, रचेंगे नूतन अब हम छंद।
गण-रथ की है वल्गा कर में, महासारथी तुम ही हो।
नई लकीरें खींच रहे हो, गण-प्रांगण में विभुवर तुम।
यश-वल्लिरियां बढ़ती जाए, करें कामना मिलकर हम।
तेरापंथ गण-गगनांगण के, दिव्य-दिवाकर तुम ही हो।
गणमाली तेरी बगियां की, कलियां आज विकस्वर हैं।
तेरी पोथी के हम पन्ने, श्रद्धामय हर अक्षर हैं।
जीओ साल हजारों गुरुवर! करुणा-कुबेर तो तुम ही हो।
जन्मोत्सव पट्टोत्सव तेरा, कैसे तुम्हें बधाए हम।
जीवन है चरणों में अर्पित, नंदी-घोष सुनाएं हम।
जय-जय नंदा, जय-जय भद्रा, गण क्षेमंकर तुम ही हो।।
(लय - कलियुग बैठा मार...)