विषय ज्ञान और आत्म-कल्याण का माध्यम बने भाषा  : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 02 मई, 2026

विषय ज्ञान और आत्म-कल्याण का माध्यम बने भाषा : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने ‘भाषाओं का ज्ञान किसलिए?’ विषय पर चतुर्विध धर्म संघ को पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने अध्ययन-अध्यापन में भाषा की उपयोगिता और उसके आध्यात्मिक पक्ष पर गंभीर प्रकाश डाला।
भाषा केवल माध्यम, मूल है 'विषय:'
आचार्य प्रवर ने फरमाया कि हमारे जीवन में भाषा एक बड़ा माध्यम है। अध्ययन और अध्यापन की प्रक्रिया में दो प्रमुख तत्व होते हैं—विषय और भाषा। अध्यात्म विद्या, भूगोल, खगोल, गणित, विज्ञान और चिकित्सा जैसे गहन विषयों को जानने के लिए भाषा केवल एक मार्ग बनती है। अपनी बात अभिव्यक्त करने और दूसरों के विचारों को समझने के लिए भाषाओं का ज्ञान अपेक्षित है।
मौलिकता के लिए भाषा का ज्ञान अनिवार्य : आचार्यश्री ने संस्कृत आदि प्राचीन भाषाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए फरमाया कि जिस भाषा के ग्रंथ हों, यदि उसी भाषा में उनका अध्ययन किया जाए तो ज्ञान में मौलिकता बनी रहती है। उन्होंने अभ्यास की महत्ता पर बल देते हुए फरमाया कि सीखी हुई भाषा निरंतर संपर्क और अभ्यास के बिना मंद पड़ सकती है। अपनी मातृभाषा में बोलना और समझना सहज होता है, किंतु अन्य भाषाओं के लिए पुरुषार्थ आवश्यक है।
भाषा के उपयोग से हो कर्म निर्जरा
शास्त्रों का उल्लेख करते हुए आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि संसार की ये विचित्र भाषाएं, व्याकरण और विभक्तियां स्वयं में 'त्राण' (शरण) देने वाली नहीं होतीं। त्राण की प्राप्ति तो केवल सम्यक् ज्ञान, दर्शन और चारित्र की आराधना से ही संभव है।
भाषा का उपयोग यदि स्वयं और दूसरों के उपकार के लिए हो, तो वह कर्म निर्जरा का माध्यम बन सकती है। साधकों को प्रयास करना चाहिए कि भाषा ज्ञान साधना में सहयोगी बने।
परीक्षा एवं परीक्षकों की घोषणा: योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत चल रहे शिक्षण-प्रशिक्षण के क्रम में आचार्य प्रवर ने आगामी परीक्षाओं के संदर्भ में परीक्षकों के नामों की घोषणा की। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया।
अभिवंदना का क्रम जारी : पूज्य गुरुदेव के जन्मोत्सव, पट्टोत्सव एवं दीक्षा दिवस (युवा दिवस) के उपलक्ष्य में चारित्रात्माओं और समणी वृंद की भावपूर्ण प्रस्तुतियों का क्रम आज भी जारी रहा।