ओस की बूंद जैसा क्षणभंगुर है जीवन, समय का सदुपयोग ही सच्ची साधना : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 04 मई, 2026

ओस की बूंद जैसा क्षणभंगुर है जीवन, समय का सदुपयोग ही सच्ची साधना : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज ‘जीवन की अनित्यता’ विषय पर गहन तात्विक विवेचन प्रस्तुत किया। आचार्यश्री ने जैन दर्शन के सुप्रसिद्ध 'नित्यानित्यवाद' के आलोक में पदार्थ और आत्मा के शाश्वत एवं नश्वर स्वरूप को वैज्ञानिक ढंग से स्पष्ट किया।
नित्य और अनित्य का सह-अस्तित्व : आचार्य प्रवर ने फरमाया कि जैन दर्शन की अवधारणा के अनुसार एक ही पदार्थ में नित्यता और अनित्यता युगपत (एक साथ) होती है। गुण-पर्याय का आश्रय स्थान द्रव्य है; न तो पर्यायहीन द्रव्य हो सकता है और न ही द्रव्य विहीन पर्याय। आकाश से लेकर दीपक तक, संसार के समस्त पदार्थ इसी सिद्धांत से संचालित हैं। आकाश अपने अनंत प्रदेशों की अपेक्षा शाश्वत है, किंतु पर्याय परिवर्तन की अपेक्षा अनित्य है। इसी प्रकार, पुद्गल के अणु शाश्वत हैं पर दीपक का पर्याय अशाश्वत है।
ओस की बूंद जैसा अस्थायी है जीवन:
उत्तराध्ययन सूत्र के दसवें अध्ययन का संदर्भ देते हुए आचार्यश्री ने जीवन की क्षणभंगुरता को दो मर्मस्पर्शी उदाहरणों से समझाया:
1. वृक्ष का पत्र: जिस प्रकार वृक्ष का पका हुआ पत्ता समय बीतने पर स्वतः गिर जाता है, वैसे ही मानव जीवन का अंत निश्चित है।
2. कुश पर ओस : कुश (घास) की नोक पर टिकी ओस की बूंद क्षण भर में ओझल हो जाती है, वैसे ही मनुष्य का जीवन अस्थायी है। गुरुदेव ने आगमकार के संदेश को दोहराते हुए प्रेरणा दी— 'समयं गोयमं मा पमायए' अर्थात् हे गौतम! क्षण भर भी प्रमाद मत करो।
साधना का संकल्प और कंठस्थीकरण:
योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हुए आचार्य प्रवर ने साधु-साध्वी एवं समणी वृन्द को उत्तराध्ययन सूत्र के 'दसवें अध्ययन' को कंठस्थ करने की प्रेरणा दी। जिनके पास यह अध्ययन पूर्व में सिद्ध है, उन्हें प्रतिदिन एक बार इसकी आवृत्ति (चितारने) का निर्देश दिया गया। आचार्यश्री ने इच्छुक चारित्रात्माओं को संस्कृत भाषा में कंठस्थीकरण का संकल्प भी कराया।
जिज्ञासा समाधान एवं अभिवंदना:
मंगल प्रवचन के उपरांत आचार्य प्रवर ने चारित्रात्माओं की विविध जिज्ञासाओं का समाधान किया। जन्मोत्सव और पट्टोत्सव के उपलक्ष्य में वर्धापना का क्रम आज भी जारी रहा, जिसमें संतों और साध्वियों ने अपनी प्रस्तुतियाँ अर्पित कीं। इस अवसर पर आचार्यश्री और साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभा जी ने श्री डूंगरगढ़ के पारख परिवार को आध्यात्मिक संबल और मंगल प्रेरणा प्रदान की।