नामधारी असंयमी साधु से बेहतर है व्रतधारी गृहस्थ : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 01 मई, 2026

नामधारी असंयमी साधु से बेहतर है व्रतधारी गृहस्थ : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आज ‘संयम और त्याग’ की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि धार्मिक परंपरा में केवल वेश का महत्व नहीं, बल्कि हृदय में स्थित सम्यक्त्व और त्याग की प्रधानता ही श्रेष्ठता का पैमाना है।
अव्रत और लालसा का त्याग ही वास्तविक धर्म : आचार्य प्रवर ने मनुष्यों को तीन श्रेणियों—अव्रती, देश विरति और सर्व विरति—में वर्गीकृत करते हुए फरमाया कि कई बार वृद्धावस्था आने पर शरीर जर्जर हो जाता है, इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं, परन्तु मनुष्य की आशा और लालसा नहीं छूटती। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि बिना त्याग के अव्रत का निरोध संभव नहीं है।
गुणस्थान के आधार पर संयम का विश्लेषण : शास्त्रों का हवाला देते हुए आचार्यश्री ने एक गंभीर तात्विक सत्य रखा। पूज्य प्रवर ने फरमाया:
नामधारी साधु बनाम गृहस्थ : यदि कोई साधु वेश में होकर भी सम्यक्त्व विहीन (प्रथम गुणस्थान वर्ती) है और परिग्रह या धन के लेन-देन में लिप्त है, तो उससे वह गृहस्थ (पंचम गुणस्थान वर्ती) कहीं श्रेष्ठ है जिसने देश विरति और सम्यक्त्व को धारण किया है।
साधुता की गरिमा: हालांकि, व्रत और संयम का पालन करने वाले सच्चे साधु सभी गृहस्थों से ऊंचे और श्रेष्ठ होते हैं। साधु वेश में रहकर वंचना करना महापाप है; जो साधुपन न पाल सके, उसे वंचना छोड़ देनी चाहिए।
योगक्षेम वर्ष : ज्ञान और स्वाध्याय का काल : आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को योगक्षेम वर्ष के दौरान आगम स्वाध्याय और ज्ञान वृद्धि के लिए प्रेरित किया।
आचार्य श्री ने फरमाया कि जानकार साधु-साध्वियों को उदारता से अध्यापन करवाना चाहिए और शिष्यों को विनयपूर्वक ज्ञान ग्रहण करना चाहिए। शुभ योगों में समय का सदुपयोग करना ही विकास का मार्ग है।
मुनि प्रसन्न कुमार जी को दी गई श्रद्धांजलि : आचार्यश्री की सन्निधि में आज मुनि प्रसन्न कुमार जी की स्मृति सभा आयोजित हुई। आचार्य प्रवर ने उनके जीवन वृत्त पर प्रकाश डालते हुए उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की।
मुख्य मुनिश्री महावीर कुमार जी एवं साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुत विभा जी ने भी उनकी आत्मा के ऊर्ध्वारोहण हेतु भावाभिव्यक्ति दी। अंत में चार लोगस्स के ध्यान के साथ उन्हें विनयांजलि अर्पित की गई।