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पुण्य और पाप अजीव हैं, पर जीव को प्रभावित करते हैं :आचार्यश्री महाश्रमण
आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी (भिक्षु चेतना वर्ष) के अंतर्गत आज शुक्ला त्रयोदशी के अवसर पर युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 'पुण्य बंध: एक विश्लेषण' विषय पर प्रवचन दिया। आचार्यश्री ने जैन वाङमय के नव तत्त्वों की व्याख्या करते हुए पुण्य-पाप और जीव-अजीव के अंतर्संबंधों को वैज्ञानिक पद्धति से स्पष्ट किया।
कर्मों का गणित: 75% पाप और 25% पुण्य : आचार्यश्री ने आठ कर्मों का परिमाणात्मक विश्लेषण करते हुए एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखा। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि:
एकान्त पाप : ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय— ये चार 'घाती कर्म' पूरी तरह पाप की श्रेणी में आते हैं।
पुण्य-पाप मिश्रित : वेदनीय, आयुष्य, नाम और गोत्र कर्मों में पुण्य और पाप दोनों की संभावना होती है।
इस आधार पर पूज्य प्रवर ने स्पष्ट किया कि कर्मों का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा पाप के खाते में और मात्र 25 प्रतिशत पुण्य के खाते में जाता है।
तेरापंथ की विशिष्ट मान्यता: निर्जरा के साथ पुण्य बंध : पुण्य बंध की विचारधाराओं पर प्रकाश डालते हुए आचार्य प्रवर ने फरमाया कि तेरापंथ धर्मसंघ में यह माना जाता है कि पुण्य का बंध निर्जरा के साथ ही होता है, इसका कोई अलग से स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। उन्होंने अन्य आम्नायों (परंपराओं) द्वारा स्वतंत्र पुण्य बंध मानने के संभावित कारणों का भी विश्लेषण किया।
मिथ्यात्वी की करणी: तेरापंथ में मिथ्यात्वी की अच्छी करणी में भी 'सकाम निर्जरा' मानी गई है, इसलिए अलग से स्वतंत्र पुण्य मानने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
दान का स्वरूप : असंयमी को दान देने के संदर्भ में तेरापंथ की स्पष्ट धारणा है कि इसमें न धर्म है और न ही पुण्य, जबकि अन्य परंपराएं इसे सिद्ध करने के लिए स्वतंत्र पुण्य बंध का सहारा लेती हैं।
साधक का लक्ष्य : केवल निर्जरा
आचार्यश्री ने साधकों को प्रेरित करते हुए कहा कि यद्यपि पुण्य के उदय से अनुकूलता, सुख और समृद्धि प्राप्त होती है, लेकिन एक आत्म-कल्याणकारी साधक का मुख्य लक्ष्य सदैव 'कर्मों की निर्जरा' करना ही होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मोक्ष (14वें गुणस्थान) तक पहुँचने के लिए अंततः पुण्य कर्मों का पूरी तरह झड़ना अनिवार्य है।