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युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के 65वें जन्मोत्सव, 17वें पट्टोत्सव एवं 53वें दीक्षा दिवस पर विभिन्न कार्यक्रम
श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा गंगाशहर के तत्वावधान में आचार्य श्री महाश्रमण जी का 17वां पट्टोत्सव दिवस मुनि अमृत कुमार व साध्वी त्रिशला कुमारी जी के सान्निध्य में शान्ति निकेतन सेवा केन्द्र में मनाया गया। इस अवसर पर बोलते हुए मुनि अमृत कुमार जी ने कहा कि आचार्य श्री महाश्रमण जी बड़ों के प्रति विनम्रता का भाव ओर छोटों के प्रति वात्सल्य भाव रखते हैं। मुनि ने कहा कि श्रामण्य का सार है उपशम। आचार्य श्री महाश्रमण जी उपशम के उच्चतम शिखर पर आरूढ़ है। विशाल धर्मसंघ का एक छत्र नेतृत्व करते हुए भी आवेश और आवेग से कोसों दूर है। मुनि उपशम कुमार जी ने भी कहा कि इस जीवन मरण के अनन्त काल के भव भ्रमण का चक्र हमें मिटाने के लिए आचार्य श्री महाश्रमण जी प्रतिदिन हमें प्रेरित करते रहे हैं। भगवान महावीर ने आज के दिन ही कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया था। ओर आज के दिन ही आचार्य श्री महाश्रमण जी ने तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य का दायित्व ग्रहण किया था। आचार्य श्री भिक्षु ने भगवान महावीर की वाणी को सरल भाषा में जनता के सामने रखा। आचार्य श्री महाश्रमण जी उस परम्परा को ओर अधिक गति प्रदान कर रहे हैं। इस अवसर पर बोलते हुए साध्वी श्री त्रिशला कुमारी जी ने आचार्य श्री महाश्रमण जी 17वें पट्टोत्सव पर उनकी अभ्यर्थना करते हुए कहा - आचारांग सूत्र मे छः जीवनीकाय का विस्तृत विवेचन है। आचार्य श्री महाश्रमण जी व छः जीवनीकाय में कुछ समानताएं भी है।
पृथ्वीकाय - पृथ्वी सबकुछ सहन करती है। आंधी हो या तुफान, भूकम्प हो या बाढ सबको समभाव से सहन करती है। वैसे ही आचार्य श्री महाश्रमण जी भी चाहे चिलचिलाती धूप हो या कड़कड़ाती सर्दी हर परिस्थिति को समभाव से सहन करते है। पृथ्यी सबका आधार है, वैसे ही आपश्री सम्पूर्ण धर्मसंथ के आधारभूत है। पृथ्वी उपजाऊ होती है जितनी भी फसलें है उनको समपोषण पृथ्वी से मिलती है। आचार्य प्रवर भी धर्मसंघ का संपोषण करते है।
अप्पकाय - पानी का स्वभाव शीतलता है। उसे कितना भी गर्म करो वह शीतल हो जाता है। पानी पवित्र होता है - आचार्यश्री महाश्रमण जी भी एक शान्त पवित्र आत्मा है। पानी निर्मल होता है। आपश्री के भावों में इतनी निर्मलता है कि राग देष की लहरें आपके आस-पास भी नहीं फटकती है। तेजस काय - अग्नि में तेज होता। आप बाह्मतेज से तेजस्वी है। आपके आभामंडल में इतना तेज है कि विरोधी से विरोधी व्यक्ति भी आपके पास आकर शांत हो जाता है।
वायु - गतिशील होती है, बिना रूके चलती रहती है आप श्री ने भी बिना रूके बिना थके सुदूर यात्राएं की है। वनस्पतिकाय - वनस्पति सबका सपोषण करती है वैसे ही आपश्री भी धर्मसंध के हर सदस्य को ज्ञान, दर्शन चारित्र का संपोषण प्रदान करते है। जैसे छ पांच स्थावर के बिना जसकाय का काम नहीं चल सकता वैसे ही आपश्री के बिना धर्मसंध का काम नहीं चल सकता है। क्योंकि तेरापंथ धर्मसंघ का एक आचार्य केन्द्रित धर्मसंध है। अंत में यही मंगल कामना करती है कि इस सम्पूर्ण सदी को अध्यात्म के आलोक से आलोकित करते रहे। साध्वी रश्मि प्रभा ने भावपूर्ण गीतिका का संगान किया। इस अवसर पर तेरापंथी सभा के मंत्री जतनलाल संचेती, तेयुप अध्यक्ष ललित राखेचा, महिला मंडल अध्यक्ष प्रेम बोथरा ने आचार्य श्री महाश्रमण जी के 17वें पदाभिषेक दिवस पर अभिवंदना की। मोहन भंसाली ने काव्यपाठ किया। मनोज छाजेड़ ने गीतिका प्रस्तुत की। कार्यक्रम का कुशल संचालन साध्वी कल्पयशा जी ने किया।