संस्थाएं
युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के 65वें जन्मोत्सव, 17वें पट्टोत्सव एवं 53वें दीक्षा दिवस पर विभिन्न कार्यक्रम
आचार्य श्री महाश्रमणजी की विदुषी सुशिष्या डॉ. साध्वी परमयशाजी के पावन सान्निध्य में '53वां दीक्षा दिवस (युवा दिवस) के कार्यक्रम का समायोजन हुआ। डॉ. साध्वी परमयशाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि मन को बाबरी बनाएं तो राम मिल जाते हैं, मन को सुदामा बनाएं तो श्रीकृष्ण मिल जाते हैं। मन को चंदनबाला बनाएं तो महावीर मिल जाते हैं और मन को शुद्ध साफ बनाएं तो महाश्रमण मिल जाते हैं।
सरदारशहर का बालक मोहन के नाम का अर्थ क्या है? मोह + न = मोह नहीं किसी से करना। अनुत्तर व्यक्तित्व के महानायक हैं आचार्य महाश्रमण। नमन अनुत्तर संयम समता को। नमन अनुत्तर ऋजुता मृदुता को। नमन अनुत्तर आचार विचार कुशलता को। नमन अनुत्तर लब्धिधारी गरिमाधारी को। आचार्य महाश्रमण एक विलक्षण आचार्य हैं। वंदनीय हैं गुरुदेव का ध्रुवयोग, साम्ययोग, सत्ययोग एवं शिवयोग को। हमारे गणपाल चिरायु हों, शतायु हों। हम सबकी सिद्धपाल करते रहें। आचार्य महाश्रमणजी की अनमोल कृति हैं साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी। आप एक दिव्य विभूति हैं। आपके जीवन में कई ऐसी खूबियां हैं जो आपको खूबसूरत बनाती रही हैं। आप समण श्रेणी से दीक्षित होने वाली पहली साध्वी हों। समणी नियोजिका पद को विभूषित करने वाली आप पहली समणी हैं। विनम्रता, विद्वता, सहिष्णुता, स्वाध्यायप्रियता आपके कर्तृत्व की ऊंचाई देने वाले पायदान हैं। साध्वी कुमुदप्रभ ने दीक्षोत्सव पर अपने आराध्य के प्रति एक मंगल पुरुष, स्वर्ण पुरुष, कोमल पुरुष आदि गुणों के बारे में विस्तार से बताया। साध्वी मुक्ताप्रभाजी ने ठाणं सूत्र के आधार पर अपने आराध्य के कांत और प्रिय के आधार पर अपने विचारों की अभिव्यक्ति दी। डॉ. साध्वी परमयशाजी, विनम्रयशाजी, मुक्ताप्रभाजी और कुमुदप्रभाजी ने 'अष्ट संपदा के मालिक गुरुवर हमारे' गीत का सुमधुर संगान किया।