स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
दीक्षा एक मार्ग है अपने आप पर नियंत्रण पाने का, भोगमुक्त एवं योगयुक्त जीवन जीने का। वैसे दीक्षा व संन्यास की परम्परा प्रायः सभी धर्मो में है। जैन-धर्म में दीक्षा मुख्यतया दो प्रकार की है-महाव्रत दीक्षा और अणुव्रत दीक्षा। इसे दूसरे शब्दों में मुनि दीक्षा और श्रमणोपासक दीक्षा भी कहा जा सकता है। मुनि-दीक्षा स्वीकार करने वाला व्यक्ति यावज्जीवन के लिए गृहस्थ-जीवन को छोड़ संन्यासी का जीवन जीता है। उसके मुख्य नियम पांच हैं-अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। ये पांच महाव्रत कहलाते हैं। श्रमणोपासक दीक्षा स्वीकार करने वाला व्यक्ति एक सीमा तक इनकी पालना करता है, इसलिए उसके लिए पांच अणुव्रत पालनीय होते हैं।
दीक्षित साधक का कर्तव्य होता है नित्य तपस्या, साधना के वे प्रयोग करना जिससे आन्तरिक बंधे संस्कार क्षीण हों एवं सत्संस्कार सृजित हों। साधना करता-करता साधक उन आत्मिक सुखों का साक्षात्कार कर लेता है जो सहज, स्थायी एवं अन्यत्र अलभ्य होते हैं। महाव्रत दीक्षा हर आदमी के लिए सम्भव नहीं है, पर अणुव्रत दीक्षा एक मध्यम मार्ग है। उसे स्वीकार कर एक साधारण व्यक्ति भी उन्नत जीवन जी सकता है।
युवक कौन?
दुनिया का कोई भी व्यक्ति बुढ़ापा नहीं चाहता। सबको यौवन प्रिय है। अनुसंधानकर्ता ऐसे उपायों की खोज में लगे हुए हैं, जिनसे अवस्था आने के बाद भी बुढ़ापे को रोका जा सके।
युवकत्व और वृद्धत्व का सम्बन्ध अवस्था के साथ नहीं, हमारी मानसिकता के साथ है। कुछ व्यक्ति उम्र से वृद्ध होने पर भी युवक होते हैं और कुछ युवावस्था में भी वृद्ध होते हैं। युवकत्व के दो लक्षण हैं- उत्साह और साहस। जिस व्यक्ति में कार्य करने का उत्साह और साहस होता है वह अवस्था से चाहे वृद्ध भी हो, वस्तुतः वह युवक ही है। जो युवक उत्साह और साहस से विहीन तथा बुजदिल होता है, वस्तुतः उसे युवा कहलाने का अधिकार नहीं है। कहा भी गया है-
प्रारभ्यते न खलु विघ्न भयेन नीचैः
प्रारम्भ्य विघ्नविहता विरमंति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः
प्राम्भ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति ।।
निम्नस्तरीय व्यक्ति में न तो उत्साह होता है और न ही संघर्षों के साथ जूझने की शक्ति होती है, फलस्वरूप वह किसी महान् कार्य को प्रारम्भ ही नहीं करता। मध्यम स्तर वाले व्यक्ति में नए-नए कार्य प्रारम्भ करने की, नई- नई योजनाएं निर्मित करने की शौक होती है और वह कार्यारम्भ भी कर देता है, किन्तु उसमें साहस नहीं होता, जिसके परिणामस्वरूप विघ्न उपस्थित होने पर प्रारम्भ की हुई आयोजना को वह बीच में ही तिलांजलि दे देता है। उत्तम श्रेणी के व्यक्ति में उत्साह और साहस दोनों होते हैं। वह कार्य को शुरू भी कर देता है और संघर्षो को साहस के साथ झेलता हुआ उसे पूरा भी कर देता है। युवक उत्तम श्रेणी का व्यक्ति होता है। वह बुझे हुए कोयले के समान नहीं, जलते हुए अंगारे के समान होता है।
जिस समाज में उत्साही और साहसी युवकों की टीम नहीं होती वह समाज विकास के पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता। वह समाज प्रगति के नये-नये आयाम उद्घाटित नहीं कर सकता। उत्साह और साहस के साथ विवेक का होना भी बहुत जरूरी है। विवेक का अर्थ है-करणीय और अकरणीय का भेद ज्ञान। उत्साह और साहस अगर करणीय तथा हितकर कार्यों में होता है तो वह विकास का कारण होता है और वही उत्साह तथा साहस अकरणीय कार्यों मैं क्रियान्वित हो जाता है तो वह विनाश का कारण बन जाता है। अतः लक्षणसंपन्न युवक के लिए आवश्यक है कि वह विवेक के द्वारा करणीय और अकरणीय का भेद कर करणीय कार्यो को उत्साह और साहस के साथ संपन्न करे।
कार्यकर्त्ता के मौलिक गुण
जैन साहित्य में मूल गुण और उत्तर गुण दो शब्द मिलते हैं। मूल गुण वे होते हैं, जिनके बिना व्यक्ति का काम नहीं चलता। जीवन में उनकी अनिवार्यता होती है और उत्तर गुण वे होते हैं जो मूल गुणों को परिपुष्ट करते हैं। एक डॉक्टर को अपने विषय का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए। अन्यथा ज्ञान के अभाव में वह सफल डॉक्टर नहीं हो सकता। इसी प्रकार कार्यकर्त्ता में भी कुछ मौलिक गुण होने चाहिए, जिससे 'कार्यकर्त्ता' नाम उसके लिए सार्थक हो सके।