स्वाध्याय
संबोधि
शरीर के इन स्थानों में चेतना की विशिष्ट अभिव्यक्ति होती है। एकाग्रता से उनका जागरण होता है। ये चैतन्य-केन्द्र हैं। योग में जो षट् चक्र का उल्लेख है वे विशिष्ट चेतना केन्द्र हैं। ये चक्र स्थूल शरीर में नहीं, किन्तु सूक्ष्म शरीर में है। मूलाधार चक्र सबसे निम्न है और सहस्रार सबसे ऊपर। शक्ति का प्रवाह मूलाधार में केन्द्रित है। कुंडलिनी शक्ति यहीं विराजमान है। यह सुषुप्त है। साधना का व्यक्त या अव्यक्त कार्य इस महाशक्ति को सहस्रार में ले जाने का है। यह नीचे से जब ऊपर की ओर उठती है तब एक-एक चक्र में से होकर प्रवाहित होती है। अनुभवी साधकों ने इसका कहीं-कहीं कुछ वर्णन किया है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने भी इसकी चर्चा की है। उनका कहना है कि कुंडलिनी के जागृत हुए बिना चेतना नहीं आती। कुंडलिनी को चेतन करना आवश्यक है। जब यह चक्रों के मध्य से होकर ऊपर जाती है, तब जो अनुभव होता है, वह इस प्रकार है- 'मनुष्य के मन की स्वाभाविक गति नीचे की तीन भूमिकाओं (गुह्य, लिंग और नाभि) में रहती है। जिससे वह भोग-विलास, खाने-पीने आदि की वृत्तियों से ऊपर नहीं उठ पाता। मन इन तीनों भूमिकाओं को पार कर हृदय-भूमि तक आ जाए तो उसे ज्योति-दर्शन होता है। परन्तु यहां से भी पुनः नीचे आने की संभावना रहती है। हृदय सें ऊपर विशुद्धिचक्र तक यदि मन की गति हो जाए तो उसे ईश्वरीय विषय की चर्चा के सिवाय दूसरी बातों में रस नहीं आता। उस समय कोई अन्य इच्छा नहीं रहती। विषयी लोगों के देखते ही डर से छिप कर बैठ जाता है। सम्बन्धी जनों से भी मिलने का मन नहीं होता। उनको देखते ही दम घुटने लग जाता था। कुंडलिनी कंठचक्र तक जाने के बाद भी नीचे की भूमि पर उतरने की संभावना बनी रहती है। साधक को इस समय सावधान रहना चाहिए। कंठचक्र को छोड़कर यदि एक बार भृकुटी आज्ञाचक्र तक आ जाए तब फिर पतन होने का भय नहीं रहता। वहां पर परमात्मा का दर्शन होकर निरन्तर समाधि-सुख की प्राप्ति होती है। उस भूमि और सहस्रार के मध्य में केवल एक कांच के समान पारदर्शक पर्दा मात्र रहता है। वहां परमात्मा इतने समीप रहता है कि हम परमात्मा के साथ एक रूप से प्रतीत होते हैं, किन्तु एकत्व प्राप्त नहीं होता है। यहां से यदि मन नीचे उतरे तो कंठ या हृदय से भी नीचे नहीं उतरता। इक्कीस दिन तक निरन्तर समाधि अवस्था में रहने से यह पर्दा सर्वथा नष्ट हो जाता है, और जीवात्मा परमात्मा के साथ एक रूप हो जाता है। यह सहस्रार कमल ही सप्तम भूमि है।'
इससे हम सहज अंकन कर सकते हैं कि साधना द्वारा व्यक्ति कैसे अपना संपूर्ण विकास साध लेता है। यह शक्ति सबमें है। किन्तु अधिकांश व्यक्ति नीचे की स्थिति में ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर देते हैं। ऊर्जा का केन्द्र मूलाधार चक्र सुप्त का सुप्त रह जाता है। शक्ति से परिपूर्ण होकर मनुष्य का अवतरण होता है और वह खाली होकर शक्ति शून्य होकर पुनः जन्म लेने के लिए चल पड़ता है। ऊर्जा का व्यय व्यर्थ के कार्यों में कर सार्थक से वंचित रह जाता है। साधना का अर्थ है- ऊर्जा का सम्यक् उपयोग करना। वह बाहर के अर्थहीन भोग विलास, घृणा, हिंसा, क्रोध, अहंकार आदि में शक्ति को योजित न होने देकर निर्माण में योजित करती है, मूलाधार से सहस्रार में स्थापित कर देती है। चक्रों पर ध्यान का यही उद्देश्य है। पिंडस्थ के प्रयोग नीचे प्रस्तुत किये जा रहे हैं जो साधकों द्वारा निर्दिष्ट हैं-
(१) मूलाधार चक्र भगाकृति है। इस चक्र में स्वयंभूलिङ्ग में तेजोरूपा कुंडलिनी शक्ति साढ़े तीन फेरे लपेटे हुए अधिष्ठित है। इस ज्योतिर्मयी-शक्ति का जीव रूप में ध्यान करने से चित्त लय होता है, एवं मुक्ति मिल जाती है।
(२) स्वाधिष्ठान चक्र को अवालांकुर जैसे उड्डीयान नामक पीठ (आसन) पर कुण्डलिनी शक्ति का चिंतन करने से भी मनोलय होगा एवं जगत् के आकर्षण की शक्ति आयेगी।
(३) मणिपुर चक्र में पांच फेरे लगाए बिजली जैसे रंग की चित्स्वरूपा भुजंगी शक्ति का ध्यान करने से अवश्य ही साधक सर्वसिद्धि पाता है।
(४) अनाहत चक्र में ज्योति स्वरूप हंस का ध्यान करने से भी चित्त हो जाता है एवं जगत् वशीभूत होता है।
(५) विशुद्ध चक्र में निर्मल ज्योति का ध्यान करने से सर्व सिद्धियां मिलती हैं।
(६) तालुमूल के ललना चक्र को घण्टिका स्थान और दशम द्वार-मार्ग कहते हैं। इस चक्र पर ध्यान लगाने से मुक्ति मिलती है।