हमारे धर्मसंघ की एक वरिष्ठ और विशिष्ट साध्वी

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साध्वी वर्धमानश्री

हमारे धर्मसंघ की एक वरिष्ठ और विशिष्ट साध्वी

शासन श्री साध्वी श्री चन्दनबाला जी हमारे धर्मसंघ की एक वरिष्ठ और विशिष्ट साध्वी थीं। उनका जीवन आदि से अंत तक श्रम की कहानी कहता है। उनका उर्जस्वल व्यक्तित्व उनके हर कार्य में मुखरित होता था। उनके हर कार्य में कला के दर्शन होते थे—चाहे पात्र-पात्रियों या मुख-वस्त्रिकाओं की रंगाई का कार्य हो या वस्त्रों की सिलाई का, वे हर कार्य में माहिर थीं। गण के प्रति और गुरु के प्रति उनकी अनन्य भक्ति थी। शासन श्री चन्दनबाला जी को तीन-तीन आचार्यों की सुखद सन्निधि प्राप्त हुई तथा उन्होंने तीनों आचार्यों की अनन्य कृपादृष्टि की पात्रता हासिल की। वे तीन-तीन साध्वी प्रमुखाओं व साध्वीवर्या की भी कृपापात्र बनीं। समस्त साधु-साध्वी समाज की वे कृपादृष्टि की पात्र बनीं। उनकी गुणवत्ताओं, क्षमताओं, निःस्वार्थ सेवा, गुरु भक्ति व संघ भक्ति में उनके व्यक्तित्व की गहराई मिलती है। सरलता, सहिष्णुता, मिलनसारिता और मधुर-भाषिता उनकी सुंदर पहचान थी। मैत्री, प्रमोद, करुणा और मध्यस्थ भावना उनके रग-रग में रमी हुई थी। उनके लिए सब—अपने-पराये, छोटे-बड़े—समान थे; उनके दिल में कोई भेदभाव नहीं था। छोटी से छोटी साध्वी हों या मुनिश्री, सबको वे अपनी वत्सलता और उदारता से रिझा लेती थीं। वे दिल की बहुत उदार थीं। उन्हें देना बहुत प्रिय था, वे किसी के श्रम की वस्तु लेना नहीं चाहती थीं। उनकी श्रम निष्ठा इतनी उच्च थी कि वे चाहती थीं सारा कार्य स्वयं ही कर लें। मौका मिलते ही वे कार्य अपने हाथ में ले लेती थीं। वे अत्यंत श्रमशीला थीं। वे किसी से नाराज़ नहीं होती थीं। उनसे कोई अच्छा व्यवहार करे या बुरा, वे साम्य भाव में रहती थीं। आचार निष्ठा, व्यवहार निष्ठा, संघ निष्ठा और गुरु निष्ठा उनके रोम-रोम में बसी हुई थी। बहिर्विहार में भी जितने भी सन्त या साध्वियाँ मिलते, वे उनकी तहे दिल से सेवा करतीं। उन्हें इतनी खुशी होती मानो उन्होंने पैरों में घुंघरू बाँध लिए हों। वे बड़े प्यार से उन्हें खिलाती-पिलातीं, उनके लिए भेंट (गिफ्ट) तैयार करतीं और उन्हें साथ रहने का आग्रह करतीं। स्थान कम हो या ज्यादा, वे पधारने वालों की सुविधा का ही ध्यान रखती थीं। शासन श्री का जीवन प्रेरक संस्मरणों से भरा पड़ा है। उनका जन्म हरियाणा प्रान्त के 'छात्तर' ग्राम में हुआ था। उनका चाँद सा मुखड़ा देखकर नाम 'चाँद कंवर' रखा गया। जन्म के एक महीने बाद पूरा परिवार भारत की राजधानी दिल्ली में प्रवासित हो गया। अपने माता-पिता की चतुर्थ पुत्री होने पर भी उनका लालन-पालन पुत्रवत हुआ। उनकी माता का नाम श्रीमती चमेली देवी व पिता का नाम श्रीमान उग्रसेन था। स्कूल के वार्षिक जलसे में जम्बु स्वामी का रोल अदा करने पर उनके अंतःकरण में वैराग्य का अंकुर प्रस्फुटित हुआ। दीक्षा की आज्ञा न मिलने पर उन्हें एक वर्ष तक कड़ा संघर्ष झेलना पड़ा। सुश्री चाँद ने पानी, रोटी, नमक और मिर्च के अलावा सभी वस्तुओं का त्याग (परिहार) कर दिया। आखिर पाषाण हृदय को पिघलना पड़ा और उनकी दीक्षा संवत् 2016 में आचार्य तुलसी के कर-कमलों से कोलकाता में हुई। उस समय दीक्षा का उत्कट विरोध हो रहा था, किंतु साध्वी श्री प्रतिभा-संपन्न थीं। उन्होंने स्कूल में हिन्दी विषय में 'रत्न' का कोर्स किया हुआ था। उन्होंने विरोध करने वाले व्यक्तियों की जिज्ञासाओं का सटीक उत्तर देकर सबको निरस्त कर दिया। गुरुदेव उन्हें वात्सल्य से 'दिल्ली वाली' कहकर पुकारते थे। चूँकि आचार्य तुलसी स्वयं कलाप्रिय थे, अतः वे उनके मन भा गईं। आचार्य तुलसी की मुँहपत्तियों, पात्रों, प्यालों और गिलासों की रंगाई तथा उनके वस्त्रों की सिलाई का कार्य प्रायः उन्हीं के कुशल हाथों से संपन्न होता था। आचार्य प्रवर की गोचरी का कार्य भी 16 वर्षों तक उन्हीं के द्वारा हुआ। आचार्य तुलसी ने उनके लिए फरमाया था कि वे भगवान महावीर की चन्दनबाला थीं और ये 'तुलसी की चन्दनबाला' हैं।
2023 के मुम्बई चातुर्मास में भगवती संवत्सरी के कार्यक्रम में महातपस्वी आचार्य महाश्रमण ने उन्हें 'शासन श्री' के अलंकरण से विभूषित किया था। साध्वी श्री ने आचार्य तुलसी के साथ-साथ आचार्य महाप्रज्ञ की भी गोचरी और सेवा का कार्य पूरी निष्ठा से किया। आचार्य महाश्रमण करुणा के महावतार हैं। शासन श्री की गुरु भक्ति, संघ भक्ति, श्रमनिष्ठा व उनकी सेवाओं का मूल्यांकन करते हुए आपने उन्हें 'शासन श्री' का खिताब देकर समलंकृत किया तथा उनको सेवा केन्द्रों में सेवा की बख्शीश प्रदान की।
 शासन श्री ने तीन-तीन साध्वी प्रमुखाओं की भी सुखद सन्निधि में रहकर अपनी बहुमूल्य सेवाएं देकर सबका कृपापूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त किया। साध्वी प्रमुखा लाडां जी उन्हें प्यार से 'चंदा मामा' कहकर पुकारती थीं। चाहे पद-प्रक्षालन का कार्य होता या कोई अन्य कार्य, आप फरमाते— 'चन्दा मामा को आने दो।' उनके कलात्मक व मुलायम हाथों का स्पर्श उन्हें बहुत अच्छा लगता था। 
शासन माता साध्वी प्रमुखा कनक प्रभा जी तो उनके साथ-साथ ही पारमार्थिक शिक्षण संस्था में भर्ती हुई थीं। दोनों एक ही कक्षा में पढ़ती थीं और उन दोनों में कॉम्पिटिशन चलता था। कभी शासन माता जी फर्स्ट आ जातीं, तो कभी शासन श्री। शासन माता जी की उन पर अत्यन्त कृपा थी। एक बार का संस्मरण है— सन् 2010 का चातुर्मास पूज्यवर का हैदराबाद में था। उस समय शासन माता जी का कक्ष 6-7 सीढ़ी चढ़कर था। शासन श्री विहार सम्पन्न कर शासन माता जी को वन्दना करने के लिए पधार रही थीं। शासन माता जी ने उन्हें दूर से देखा और तत्काल प्रातरास (नाश्ता) करते हुए बाहर पधारीं। उन्होंने शासन श्री से फरमाया— 'अभी ऊपर नहीं आना है।' फिर विनोद में पुनः फरमाया— 'अभी ऊपर जाने की देरी है (अर्थात् अभी आयु शेष है)।' यह सुनकर सारा वातावरण प्रसन्नता से भर गया। आप समय-समय पर उनके लिए, उनके अनुकूल खाद्य-पदार्थ भिजवाते रहते थे। साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी भी उनसे बहुत प्रसन्न रहती थीं। सन् 2015 के कोबा चातुर्मास में आपने उन्हें बहिर्विहारी होने के बावजूद अपने निकटवर्ती कक्ष में ठहराया, जबकि अन्य सभी बहिर्विहारी साध्वियों को अन्य ब्लॉक में ठहराया गया था। शासन श्री ने अपने संपर्क में आने वाले सभी साधु-साध्वियों के दिल में स्थान बनाया। इतना ही नहीं, श्रावक-श्राविकाएं भी उनकी उपासना कर अति प्रसन्न होते थे। मैंने उन्हें कभी भी किसी श्रावक-श्राविका को यह कहते हुए नहीं सुना कि उनकी सेवा हो गई, अब उनके प्रतिक्रमण या प्रतिलेखना का समय हो गया है। उनके जीवन में अनेक डॉक्टरों से संपर्क हुआ। वे इतनी आत्मीयता से बात करती थीं कि सब उनके अपने हो जाते थे। मुंबई के हिंदुजा हॉस्पिटल की बात है, शासन श्री बी.पी. (B.P.) के अप-डाउन होने से बहुत परेशान थीं। वहाँ एक बहुत अनुभवी सीनियर डॉक्टर था, जिसकी फीस भी बहुत अधिक थी। साध्वी श्री ने उनसे कहा— 'आप यदि फीस लोगे तो गुरुदेव हमें पनिशमेंट (दंड) देंगे।' यह सुनकर डॉक्टर चकित रह गया। उसने कहा— 'आप मेरी माँ के समान हैं, क्या मैं आपको पनिशमेंट दिलवाऊंगा? कभी नहीं।' और उसने एक ही झटके में सारी फीस माफ कर दी। इस प्रकार शासन श्री का जीवन महिमा-मंडित एवं बहुमुखी व्यक्तित्व का धनी था। उनकी गायन शैली, वक्तव्य शैली, प्रवचन शैली और रचना शैली बेजोड़ थी। जिस किसी क्षेत्र में उनका प्रवचन होता, जनता कहती— 'ऐसा लगता है, गुरु तुलसी फरमा रहे हैं।' वैसा ही जोश, वैसा ही उत्साह और वैसा ही सब कुछ। उनके संस्मरणों और उनके संदेशों का कोई आर-पार नहीं है।
किसी कवि ने ठीक ही लिखा है:
जितना भी लिखें, लिखना शेष रह जाता।
तेरा ये विराट रूप, कल्पना में नहीं समाता।।