नंदनवन गण मंगलकारी प्रभु तेरी महिमा है न्यारी

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साध्वी मलयप्रभा

नंदनवन गण मंगलकारी प्रभु तेरी महिमा है न्यारी

वर्धापन के उजले पल में, अर्पित भावों का उपहार।
धर्मसंघ के ओ चक्रीश्वर! जीओ-जीओ वर्ष हजार।।
शासन कितना गौरवशाली, बैठे गणनंदनवन डाली,
मन मैना है ये मतवाली, रहती आठोंयाम दीवाली,
जय ज्योति चरण जय महाश्रमण की, गूंजे भू नभ जय-जयकार।।
अभयदयाणं चक्खुदयाणं, मग्गदयाणं तुम हो विभुवर!
धम्मदयाणं बोहिदयाणं, सरणदयाणं तुम हो प्रभुवर!
वीतराग सी मूरत पाकर, खिला-खिला ये गण मंदार।।
जहाँ कहीं पधराएं गणिवर, यश-ध्वज चलता आगे-आगे।
शिष्ट मिष्ट इष्ट वाणी सुन, जन-जन जागे दुर्गुण त्यागे।
महाश्रमणिक तव श्रम बूंदों से, उपकृत है सारा संसार।।
गण गोकुल घनश्याम दिखाते, संघ-चमन में नव्य नजारे।
योगक्षेम वर्ष वरदायी, जीवन की जो आभा संवारे।
भिक्षु जन्म त्रय शताब्दी अवसर, राजधानी में भव्य बहार।।
भरा हुआ गागर में सागर, जीवन तेरा क्या गुण गाऊं।
कहकर लिखकर गाकर भी मैं, रही अधूरी पार न पाऊं।
शब्दों का परिधान रिकाने, कहां सक्षम है तारणहार।।
युगों-युगों तक तपो धरा पर, प्रबल प्रतापी ओ कीर्त्तिधर!
रहो निरामय बनो चिरायु, दिव्य दिवाकर ओ शक्तिधर!
सुधा सन्निधि निर्मल आभा, बन जाएं शिव सुख दातार।।
कृपा दृष्टि की नेहिल नजरें, चाहूं बस यूं ही हर बार।।