गुरुवाणी/ केन्द्र
विकसित भारत के लिए भौतिक प्रगति के साथ आध्यात्मिक व नैतिक उत्थान अनिवार्य : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने ‘ऋषि कैसे हों?’ विषय पर अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि साधुता केवल एक वेष नहीं, बल्कि अनंत काल की यात्रा की महानतम उपलब्धि और संयम की पराकाष्ठा है। साधु : पंच महाव्रतों की जीवंत मूर्ति : आचार्य प्रवर ने साधु जीवन की अनिवार्यताओं को रेखांकित करते हुए फरमाया कि एक ऋषि को अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—इन पांच महाव्रतों का मन, वचन व काया से पालन करना चाहिए। साधु न हिंसा करता है, न करवाता है और न ही अनुमोदना करता है। रात्रि भोजन का त्याग और कंचन-कामिनी (धन-संपत्ति व काम वासना) से पूर्ण विरक्ति ही साधु को 'अपरिग्रह की मूर्ति' बनाती है।
क्षमा और शांति ही साधु का आभूषण : शांतिदूत ने संतत्व को परिभाषित करते हुए फरमाया— 'संत वही है, जो शांत है।' साधु के जीवन में क्रोध, आवेश और प्रदर्शन का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। यदि कोई अवहेलना या अपशब्द भी कहे, तो साधु को क्षमा धारण कर महान प्रसन्नता (प्रसाद) के भाव में रहना चाहिए। साधु का दृष्टिकोण उदार हो, वह आग्रही न बने और दूसरों के उचित विचारों को ग्रहण करने का साहस रखे। साध्वी शकुंतला जी का दीक्षा स्वर्ण जयंती वर्ष : इस अवसर पर साध्वी शकुंतला जी के दीक्षा के 50 वर्ष संपन्न होने पर आचार्यश्री ने मंगल प्रेरणा प्रदान की। साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने साध्वी श्री के प्रति आध्यात्मिक मंगल कामना व्यक्त की। साध्वी शकुंतला जी ने भी गुरुदेव के समक्ष अपनी विनम्र श्रद्धाभिव्यक्ति दी।
देश के विकास हेतु 'पंच-मुखी' सूत्र : मंगल प्रवचन के दौरान विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने आचार्यश्री के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर पूज्य प्रवर ने राष्ट्र निर्माण हेतु पांच अनिवार्य स्तंभ बताए:
१. भौतिक विकास, २. आर्थिक विकास, ३. शैक्षिक विकास, ४. आध्यात्मिक विकास, ५. नैतिक विकास
आचार्यश्री ने बल दिया कि भारत
के नागरिकों में धर्म के संस्कार, नशामुक्ति और त्याग की भावना का विकास होना चाहिए।
अभिवंदना एवं पाथेय: कार्यक्रम के अंत में आचार्य प्रवर ने आलोक कुमार के आगमन को सराहा और उन्हें संस्कारों के उन्नयन हेतु निरंतर प्रयास करने की प्रेरणा दी।