श्रुत की आराधना ही है मोक्ष का सत्पथ, साधना के लिए करें ज्ञानार्जन : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 11 मई, 2026

श्रुत की आराधना ही है मोक्ष का सत्पथ, साधना के लिए करें ज्ञानार्जन : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आज ‘श्रुतभ्यास क्यों करें’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने शास्त्रों के अध्ययन को मोक्ष प्राप्ति का सशक्त माध्यम बताते हुए इसे स्व-पर कल्याण का आधार बताया। उत्तम अर्थ की खोज और श्रुत का आश्रय : आचार्य प्रवर ने प्रवचन की शुरुआत में एक मूलभूत प्रश्न खड़ा किया—श्रुत का आश्रयण कौन ले और क्यों ले? शास्त्रकार के वचनों को उद्धृत करते हुए उन्होंने फरमाया कि जो 'उत्तम अर्थ' की खोज में है, उसे श्रुत का आश्रय लेना चाहिए। यहाँ उत्तम अर्थ से तात्पर्य 'मोक्ष' से है। उन्होंने चार पुरुषार्थों का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि 'काम-अर्थ' सांसारिक युगल हैं, जबकि 'धर्म-मोक्ष' आध्यात्मिक युगल। इन चारों में मोक्ष ही परम साध्य है, जिसे प्राप्त करने के लिए ज्ञान का अभ्यास अनिवार्य है।
श्रुताभ्यास के बहुआयामी लाभ: श्रुत की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए आचार्यश्री ने इसके व्यावहारिक और आध्यात्मिक लाभ गिनाए: १.विवेक की जागृति: शास्त्रों के अध्ययन से साधक में कल्पनीय-अकल्पनीय और करणीय-अकरणीय (क्या करना चाहिए और क्या नहीं) का विवेक जागृत होता है। २.स्व-पर कल्याण: ज्ञान संपन्न साधक स्वयं सन्मार्ग पर चलता ही है।साथ ही दूसरों को प्रतिबोध देकर उन्हें भी गलत मार्ग से हटाकर मोक्ष की ओर अग्रसर करने में सहायक बनता है। ३.अध्यात्म की सेवा : पात्र और योग्य जिज्ञासुओं को ज्ञान प्रदान करना भी धर्मसंघ की एक महान सेवा है।
विद्या के साथ विनय और मौन का संगम: ज्ञान प्राप्ति के उपरान्त आने वाले विकारों के प्रति सचेत करते हुए आचार्य प्रवर ने फरमाया कि श्रुत होने पर भी अहंकार का प्रवेश नहीं होना चाहिए। विद्या तभी शोभित होती है जब उसके साथ 'विनय' का योग हो। पूज्य प्रवर ने विशेष रूप से 'मौन' की प्रेरणा देते हुए फरमाया कि ज्ञान का प्रदर्शन या दिखावा नहीं करना चाहिए; आवश्यकता होने पर ही बोलना चाहिए। जिज्ञासा समाधान एवं श्रद्धाभिव्यक्ति: मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्य प्रवर ने चारित्रात्माओं की विविध जिज्ञासाओं का तात्विक समाधान किया। गुरुदेव की अभिवंदना के क्रम में साध्वी स्तुतिप्रभा जी ने सुमधुर गीत का संगान किया और साध्वी वीरप्रभा जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। नन्हे बालक परम और पार्थ बच्छावत ने भी अपनी प्रस्तुति से आराध्य के चरणों में वंदना अर्पित की।