गुरुवाणी/ केन्द्र
शंख में दूध की भांति शोभित होता है ज्ञान और संयम का संगम : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज ‘बहुश्रुत की महिमा’ विषय पर पावन पाथेय प्रदान किया। आचार्यश्री ने ज्ञानार्जन हेतु किए जाने वाले कठोर श्रम और संयम को रेखांकित करते हुए चारित्रात्माओं को आगमों के गहन स्वाध्याय हेतु प्रेरित किया। श्रम और संयम से खिलता है 'बहुश्रुत' का पद : आचार्य प्रवर ने फरमाया कि बहुश्रुत होना एक साधु का विशेष गुण है। हजारों पद्यों को कंठस्थ करने और उस ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए निरंतर 'चितारने' (दोहराने) में भारी श्रम और समय लगता है। पूज्य प्रवर ने स्पष्ट किया कि यद्यपि वर्तमान युग में पूर्वों का ज्ञान रखने वाले उत्कृष्ट बहुश्रुत की आशा कम है, फिर भी यदि किसी को आगमों का अच्छा ज्ञान है, समझाने की शैली प्रभावशाली है और समसामयिक विषयों का बोध है, तो वह भी एक प्रकार से बहुश्रुत ही है।
आचार्य पद में ही समाहित हैं उपाध्याय और साधु पद : पंच परमेष्ठी के पदों की व्याख्या करते हुए आचार्यश्री ने एक महत्वपूर्ण तथ्य रखा। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि तेरापंथ धर्मसंघ में आचार्य भिक्षु से लेकर अब तक किसी को अलग से उपाध्याय पद नहीं दिया गया है, क्योंकि आचार्य के तीसरे पद में ही उपाध्याय और साधु पद समाविष्ट हैं। आचार्य की 'अष्टगणी संपदा' में श्रुत संपदा का विशेष महत्व है। आचार्य जब स्वयं आगमों की वाचना देते हैं, तो उससे शिष्यों का मार्गदर्शन होने के साथ स्वयं का भी स्वाध्याय होता है।
शंख और दुग्ध सा धवल हो ज्ञान व आचरण : उत्तराध्ययन सूत्र के ग्यारहवें अध्ययन का उदाहरण देते हुए गुरुदेव ने फरमाया कि जिस प्रकार शंख में दूध शोभा देता है, उसी प्रकार एक बहुश्रुत साधु में ज्ञान के साथ-साथ साधना पक्ष भी सबल होना चाहिए। यहाँ दूध (ज्ञान) और उसका आधार शंख (साधु) दोनों ही स्वच्छ होने चाहिए। साधु की महिमा ज्ञान से है और ज्ञान की महिमा साधु के पवित्र आचरण से होती है।
खमतखामणा एवं अभिवंदना : मंगल प्रवचन के उपरांत गुरुकुलवास (गुरु सन्निधि) में बाद में पधारीं साध्वी गवेषणाश्री जी, साध्वी निर्मलयशा जी, साध्वी पीयूषप्रभा जी एवं साध्वी विद्यावती जी (प्रथम) की सहवर्ती साध्वियों ने मुख्य मुनिश्री महावीर कुमार जी एवं अन्य अग्रगाणी संतों से 'खमतखामणा' (क्षमापना) की। संतों की ओर से मुनि धर्मरुचि जी स्वामी ने साध्वियों से क्षमा याचना की। कार्यक्रम के अंत में साध्वी मलयप्रभा जी, साध्वी राजश्री जी, साध्वी ऋजुप्रज्ञा जी और मुनि ऋषिकुमार जी ने गीतों व वक्तव्यों के माध्यम से अपने आराध्य की वंदना की।