केवल ज्ञान नहीं, आचरण की पवित्रता से ही बनता है व्यक्ति शिक्षाशील : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 08 मई, 2026

केवल ज्ञान नहीं, आचरण की पवित्रता से ही बनता है व्यक्ति शिक्षाशील : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज ‘शिक्षाशील कौन’ विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से तात्विक देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि बहुश्रुत बनने की पहली सीढ़ी शिक्षा के प्रति अटूट रुचि और आचरणात्मक शुद्धता है।
शिक्षाशील बनने के आठ आगम सम्मत लक्षण :
आचार्य प्रवर ने फरमाया कि केवल अध्ययन में रुचि रखना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक सच्चे शिक्षाशील साधु या श्रावक के लिए आठ गुणों का होना अनिवार्य है:
१. मर्यादित हास्य : अधिक हंसी-मजाक में आसक्त न होना और संयमित व्यवहार करना।
२. इन्द्रिय दमन : मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना, विशेषकर खान-पान में आसक्ति का त्याग।
३. निरंतर अभ्यास : ज्ञान को सीखने के साथ उसका चिंतन और दोहरान करना, ताकि वह विस्मृत न हो। व्याकरण का ज्ञान भाषा की शुद्धता के लिए आवश्यक है।
४. मर्मगोपन : किसी की गुप्त बात या दोषों को जगत में प्रकाशित (मर्मोद्घाटन) न करना।
५. अदोष आचार : अपने आचरण को दोषमुक्त रखना और अनुशासन प्रिय बनना।
६. निर्लोभता : जीवन में अतिलोलुपता का त्याग करना।
७. अक्रोध एवं विनय: क्रोध पर विजय प्राप्त करना और बड़ों के प्रति सदैव विनय भाव रखना।
८. सत्यरत : स्वयं और दूसरों के संदर्भ में सदैव सत्य का साथ देना और असत्य भाषण से बचना।
जिज्ञासा समाधान एवं आध्यात्मिक प्रस्तुति:
मंगल प्रवचन के उपरांत साध्वी जिनप्रभा जी एवं साध्वी श्रुतयशा जी ने ‘आराधक-विराधक’ विषय पर अपनी सारगर्भित अभिव्यक्ति दी। इस विषय पर आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को जिज्ञासा प्रस्तुत करने का अवसर दिया, जिनका साध्वी द्वय ने समाधान किया।
कार्यक्रम के अंत में छोटी समणी वृन्द ने एक रोचक नाटिका के माध्यम से अपने आराध्य की अभ्यर्थना की, जिसे सभा ने खूब सराहा।