गुरुवाणी/ केन्द्र
विनम्रता ही ज्ञान का द्वार, अहंकार और आलस्य हैं शिक्षा के प्रबल शत्रु : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने ‘शिक्षा के बाधक तत्त्व’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान किया। आचार्यश्री ने श्रुत (ज्ञान) की महिमा गाते हुए स्पष्ट किया कि बहुश्रुत होना जीवन की एक महान उपलब्धि है, जिसे केवल विनम्रता और पुरुषार्थ से ही पाया जा सकता है।
स्वाध्याय : सर्वश्रेष्ठ तप और श्रुत की परंपरा : आचार्य प्रवर ने शास्त्रों का उल्लेख करते हुए फरमाया कि बाह्य और आभ्यंतर भेदों वाले बारह प्रकार के तपों में स्वाध्याय के समान कोई दूसरा तप न हुआ है और न होगा। पूज्य प्रवर ने आचार्य भिक्षु का उदाहरण देते हुए कहा कि धर्मसंघ में अध्ययन-अध्यापन की धारा अविच्छिन्न चलनी चाहिए। भक्तिपूर्वक श्रुत की आराधना करना साक्षात् जिनेश्वर भगवान की आराधना के तुल्य है।
महापुरुषों के बहुश्रुत का स्मरण: योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत ज्ञान विकास का आह्वान करते हुए पूज्य प्रवर ने शासन के महान श्रुतधरों का स्मरण किया। उन्होंने श्रीमद जयाचार्य की प्रतिभा, आचार्य श्री भिक्षु की प्रज्ञा और आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के आगम संपादन में अद्वितीय योगदान का उल्लेख किया। आचार्यश्री ने मुनि तुलसी की पाठशाला के यशस्वी शिष्यों—मुनि नथमल जी (टमकोर) और मुनि बुद्धमल जी स्वामी के ज्ञान विकास को वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बताया।
सावधान! ये पांच तत्व रोकते हैं आपकी शिक्षा : आचार्यश्री ने आगमों के आधार पर शिक्षा प्राप्ति में बाधक पांच प्रमुख तत्वों का विस्तार से विवेचन किया:
१. अहंकार : विनीत भाव के बिना ज्ञान की प्राप्ति असंभव है। अहंकार ज्ञान के मार्ग का सबसे बड़ा अवरोध है।
२. क्रोध : क्रोधी व्यक्ति की एकाग्रता भंग हो जाती है, जो अधिगम में बाधक है।
३. प्रमाद : विकथा और हास्य-विश्राम में समय गंवाने वाला व्यक्ति बहुश्रुत नहीं बन सकता।
४. रोग : शारीरिक व्याधि या अस्वस्थता ज्ञान अर्जन में व्यवधान उत्पन्न करती है।
५. आलस्य : उत्साह की कमी और आलसी स्वभाव ज्ञान के प्रकाश को रोक देता है।
गुरुदेव ने प्रेरणा देते हुए फरमाया कि इन पांच बाधाओं से बचकर जो परिश्रम करता है, वह निश्चित ही बहुश्रुत बन सकता है।
श्रद्धाभिव्यक्ति एवं अभिवंदना : मंगल प्रवचन से पूर्व साध्वी राजीमती जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। प्रवचन के उपरान्त अनेक साधु-साध्वियों ने गीतों और वक्तव्यों के माध्यम से अपने आराध्य की अभ्यर्थना की और पट्टोत्सव के उपलक्ष्य में वंदना की।