भवसागर तैर लिया तो अब किनारे पर क्यों खड़े हो? प्रमाद छोड़कर पार उतरो :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 06 मई, 2026

भवसागर तैर लिया तो अब किनारे पर क्यों खड़े हो? प्रमाद छोड़कर पार उतरो :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी ने चतुर्विध धर्मसंघ को 'त्वरा' (शीघ्रता) करने का पावन संदेश दिया।
आचार्यश्री ने भगवान महावीर और मुनि गौतम के संवाद के माध्यम से जीवन के अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु प्रमाद त्यागने की प्रेरणा दी।
गौतम! अब किनारे पर मत रुको : आचार्य प्रवर ने फरमाया कि भगवान महावीर मुनि गौतम को संबोधित करते हुए कह रहे हैं— 'हे गौतम! तुमने संसार रूपी महान समुद्र को तो तैर लिया है, अब तुम किनारे पर आकर क्यों खड़े हो? पार पहुँचने के लिए थोड़ा और पराक्रम करो और क्षण भर भी प्रमाद मत करो।' आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि यहाँ दो प्रकार के समुद्र हैं—पहला जन्म-मरण की परंपरा वाला 'भव सागर' और दूसरा 'कर्म रूपी अर्णव'। चूँकि मुनि गौतम का यह अंतिम भव था, इसलिए भगवान उन्हें शेष कर्मों को भी शीघ्र काट लेने का निर्देश दे रहे हैं।
संयम बनाम प्राण: साधना की सर्वोच्चता : चारित्रात्माओं को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने अत्यंत महत्वपूर्ण पाथेय प्रदान किया। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि हमारे जीवन में कभी भी साधुपन या संन्यास छोड़ने की भावना नहीं आनी चाहिए। गुरुदेव ने आह्वान किया।
१.संयम रूपी रत्न को हर कठिन परिस्थिति में सुरक्षित रखें।
२.यदि कभी प्राण और संयम में से किसी एक को चुनना पड़े, तो साधु को सहर्ष संयम का चुनाव करना चाहिए।
३.यह मनोबल रहे कि 'प्राण भले चले जाएं, पर मेरा साधुपन न जाए।'
मुमुक्षु दीक्षा की स्वीकृति एवं अन्य कार्यक्रम : मंगल प्रवचन के दौरान एक विशेष आध्यात्मिक प्रसंग तब आया जब वैरागण जिनाज्ञा ने पूज्य प्रवर के समक्ष अपनी उत्कृष्ट भावनाओं की अभिव्यक्ति दी।
आचार्य प्रवर ने कृपापूर्वक जिनाज्ञा को मुमुक्षु रूप में साधना करने की सहर्ष स्वीकृति प्रदान की।
इसके उपरांत, आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की विविध जिज्ञासाओं का समाधान किया। गुरुदेव के जन्मोत्सव और पट्टोत्सव के उपलक्ष्य में वर्धापना का क्रम आज भी जारी रहा, जिसमें साधु-साध्वियों ने अपनी श्रद्धापूर्ण प्रस्तुतियाँ अर्पित कीं।