मुनि प्रसन्न कुमार जी एक दबंग, साहसी और निर्भीक संत थे

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मुनि सिद्ध प्रज्ञ

मुनि प्रसन्न कुमार जी एक दबंग, साहसी और निर्भीक संत थे

तेरापंथ धर्म संघ में प्रथम बंधु त्रिपुटी के रूप में मुनि स्वरूपचंद जी मुनि भीमराज जी और मुनि जितमल जी का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाता हैl मेने उन्हें देखा नही पर आचार्य तुलसी के साशन काल में हुवे इन तीन संतो को एक साथ देखने का मौका मिला। तेरापंथ में लगभग 50 वर्षो तक बंधु त्रिपुटी मुनि संजय कुमार जी मुनि प्रकाश कुमार जी ओर मुनि प्रसन्न कुमार जी का कालमान रहाl मुनि प्रसन्न कुमार जी का जीवन साधना, सेवा, समर्पण और सरलता का अद्भुत संगम था। वे केवल एक संत नहीं, बल्कि धर्मसंघ के प्रति पूर्ण निष्ठावान, अनुशासनप्रिय और आत्मीय व्यक्तित्व के धनी थे। मुनि प्रसन्न कुमार जी एक दबंग, साहसी और निर्भीक संत थे। अपने संयम जीवन में तप, त्याग और साधना के माध्यम से उन्होंने अनगिनत आत्माओं को धर्ममार्ग की प्रेरणा प्रदान की। उनका व्यवहार अत्यंत विनम्र, मधुर और प्रभावशाली था।
वे जहाँ भी रहे, वहाँ धर्म, संस्कार और जागृति का वातावरण निर्मित हुआ। मुनिश्री का अचानक देवलोक गमन धर्मसंघ के लिए अपूरणीय क्षति है। उनके व्यक्तित्व में साधुता की गरिमा, चिंतन की गहराई और करुणा का अद्भुत समन्वय था। 'संत शरीर से दूर हो सकते हैं, लेकिन उनके संस्कार, उनके विचार और उनका तपस्वी जीवन सदैव हमारे हृदय में जीवित रहता है। मुनि प्रसन्न कुमार जी का जीवन संयम-साधना की उज्ज्वल मिसाल था। उनके चरणों में विनम्र श्रद्धांजलि।' अंत में मुनि सिद्ध प्रज्ञ जी ने दिवंगत संत के प्रति भावांजलि अर्पित करते हुए कहा कि हम सभी उनके आदर्शों को आत्मसात कर अपने जीवन को धर्ममय बनाने का प्रयास करें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। मुनि प्रसन्न कुमार की सबसे बड़ी विशेषता उनका निर्भीक, स्पष्टवादी और प्रभावशाली व्यक्तित्व था। वे साधु जीवन की मर्यादाओं का दृढ़ता से पालन करने वाले अनुशासनप्रिय संत थे। उनके जीवन में साधना, सेवा, तप और त्याग का अद्भुत समन्वय दिखाई देता था।