स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
कार्यकर्त्ता एक समस्त पद है। पद विभाजन करने से दो शब्द हो जाते हैं – कार्य और कर्त्ता-यानी काम करने वाला। शाब्दिक अर्थ है-काम करने वाला। कौन व्यक्ति ऐसा होगा जो कुछ भी काम नहीं करता। आदमी खाता है, पीता है, सोता है, अपने परिवार के लिए कमाई करता है, पढ़ता है, लिखता है, यह सब काम है और काम करने वाला कार्यकर्त्ता है। इस शाब्दिक अर्थ से तो ऐसा कोई व्यक्ति मिलना कठिन होगा, जो कार्यकर्त्ता न हो। किन्तु कार्यकर्ता शब्द के अर्थ में हमें कुछ और जोड़ देना चाहिए।
वह व्यक्ति कार्यकर्त्ता होता है जो औरों के लिए काम करता है। कार्यकर्त्ता की पहली विशेषता या पहला मौलिक गुण होता है कि उसमें परार्थ को भावना होती है। कई बार श्रद्धेय आचार्यप्रवर अपने प्रवचन में तीन शब्दों का प्रयोग करते हैं—स्वार्थ, परार्थ और परमार्थ। काम करने के तीन उद्देश्य होते हैं-अपने लिए, दूसरों के लिए या फिर परम-मोक्ष के लिए।
एक कार्यकर्त्ता में परमार्थ के लिए काम करने की भावना हो या न हो, पर कम से कम परार्थ भावना अवश्य हो, दूसरों के लिए कुछ करने वाला हो। यह विशेषता उसमें अवश्य होनी चाहिए। इसे भले परार्थ भावना कह दें या फिर दूसरे शब्दों में कहना चाहें तो सेवा-भावना कह दें। पर-कल्याण महान सेवा है।
सेवा-भावना के बिना कार्यकर्त्ता की कर्तृत्व-शक्ति का आधार ही नहीं होता है। कार्यकर्तृत्व का आधार है सेवाभावना और सेवाभावना संवेदनशीलता के साथ जुड़ी हुई है। यदि संवेदनशीलता नहीं है, दूसरों के सुख-दुःख को या कठिनाइयों को अनुभव करने की जिसमें चेतना विकसित नहीं है, वह परार्थ कुछ नहीं कर सकता और जो दूसरों की कठिनाइयों का संवेदन करता है, उसे समझता है, पहचानता है, जानता है, कुछ करने की भावना जागती है तो वह सच्चे अर्थो में कार्यकर्त्ता कहलाता है।
जो व्यक्ति जीवन में विशिष्ट कार्य करता है तो बीच में कठिनाइयां भी हो सकती है पर कार्यकर्त्ता में यह विशेषता होनी चाहिए कि वह कठिनाइयों से घबराए नहीं, उन्हें साहस के साथ झेले।
कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, वह उन्हें पार करने का प्रयास करें।
डर की क्या बात, पथिक काली रातों में,
पथ में उजियाला होगा, लो दीपक हाथों में।
दुनिया के दीपक धोखा दे सकते हैं,
पर साहस का दीपक जलता झंझावातों में।।
कार्यकर्त्ता का दूसरा मौलिक गुण होना चाहिए-साहस। वह कठिनाइयां आने पर भी अपना कार्य बन्द न करे, उनका आत्मविश्वास के साथ सामना करे। बहुत-सी कठिनाइयां तो अपने आप में शक्तिहीन होती हैं। व्यक्ति यदि घबराए नहीं, कुछ आगे बढ़कर उनका मुकाबला करे तो कई बार ऐसा लगता है कि कठिनाई कुछ थी ही नहीं, हमने कल्पना से कठिनाई मान ली। वह दिखने वाली कठिनाई अपने आप समाप्त हो जाती है।
कार्यकर्त्ता में साहस होना चाहिए क्योंकि अनेक बार झूठा भय हमारे सामने होता है और हम घबरा जाते हैं। जल्दबाजी में अकरणीय कर बैठते हैं या अनहोना हो जाता है।
जो व्यक्ति काम करता है, उसकी आलोचना भी हो सकती है। भले वह व्यक्ति अपने ढंग से अच्छा काम भी क्यों न करता हो। समाज में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनका दृष्टिकोण निषेधात्मक होता है और वे अच्छे काम करने वाले व्यक्ति को भी कुछ-न-कुछ आलोचना करते रहते हैं। उनमें दोषों को ढूंढ़ते रहते हैं। ईर्ष्या रखने वाले लोग काम करने वालों की छवि को खराब करने का हर संभव प्रयास कर सकते हैं, ऐसे परिवेश में कार्यकर्त्ता के लिए अपने दिमाग को अप्रभावित रखना जरूरी होता है।
आलोचक आलोचना करते रहेंगे और काम करने वाले काम करते रहेंगे, यह संतुलित सोच होना जरूरी है। आलोचना के विषय में तटस्थ चिन्तन करें। उपयोगी लगे, जो सच्ची लगे, उसको मूल्य दें, शेष सबको छोड़ दें, यह विवेक-चेतना अवश्य जागे। एक अच्छा कार्यकर्त्ता अनावश्यक निन्दा सुनकर कभी अपना संतुलन नहीं खोता और न अपने दिमाग को बोझिल तनावग्रस्त करता है। कार्यकर्त्ता में इतना विकास होना चाहिए कि आलोचना करने वालों के प्रति भी विरोध का भाव न रखे, मन में मैत्री का भाव जगाए। इस संदर्भ में मेरा ऐसा मत है कि जब दूसरे लोग झूठी आलोचना करते हैं, उस समय व्यक्ति यदि तटस्थ रहता है, संतुलित रहता है तो आज के आलोचक कल उसके प्रशंसक बन सकते हैं।
व्यक्ति का यदि रास्ता सही है, काम सही है तो आलोचना करने वाले भी समय आने पर समर्थक और अनुकूल बन सकते हैं। कार्यकर्त्ता का तीसरा मौलिक गुण होना चाहिए-सहिष्णुता।