संबोधि

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

(७) आज्ञाचक्र में वर्तुलाकार ज्योति का ध्यान करने से साधक मोक्ष पद पाता है।
(८) ब्रह्मरन्ध्र में अष्टम चक्र स्थित सूई की नोक जैसा धूम्राकार जालन्धर नामक स्थान पर ध्यान द्वारा चित्तलय करने से निर्वाण पद मिलता है।
(९) सोम-चक्र में पूर्ण सच्चिद्रूपा अर्द्धशक्ति का ध्यान करने से मनोलय होता है। एवं मोक्षपद लाभ होता है।
(१०) परम-आनंद के साथ अपने हृदय के बीच में इष्ट देवता की मूर्ति का ध्यान करने से साधक आत्मलीन हो जाता है।
(११) एकान्त में शववत् (मुर्दे जैसा) चित्त लेट कर एकाग्रचित्त से अपने दाहिने पैर के अंगूठे पर दृष्टि स्थिर करके ध्यान करने से शीघ्र ही चित्तलय होता है। यह चित्तलय करने का प्रधान और सहज उपाय है।
(१२) जीभ को तालुमूल में लगा ऊपर उठाये रखें। इससे चित्त एकाग्र होकर परम पद में लीन हो जाता है।
(१३) नाक के ऊपर दृष्टि रखकर बारह अंगुल पीली या आठ अंगुल लाल वर्ण की ज्योति का ध्यान करने से चित्तलय हो जाता है एवं वायु स्थिर हो जाती है।
(१४) ललाट के ऊपर शरद् के चन्द्र जैसी श्वेत वर्ण-ज्योति का ध्यान करने से मनोलय हो जाता है एवं आयु बढ़ती है।
(१५) देह के बीच में निर्वात निष्कम्प दीपकलिका जैसा अष्ट अंगुल ज्योति का ध्यान करने से जीव मुक्त हो जाता है।
(१६) दोनों भौहों के बीच सूर्य जैसे तेजपुञ्ज का ध्यान करने से ईश्वर का सदर्शन मिलता है।
श्वास-जिसने आनापान (श्वास) स्मृति का सम्यक् अभ्यास कर लिया है वह व्यक्ति बादलों से मुक्त आकाश में चन्द्रमा की भांति लोक को प्रकाशित करता है। आनापान स्मृति ध्यान का महत्त्व इससे स्पष्ट होता है। श्वास शरीर का वह भाग है जो निरन्तर स्वेच्छापूर्वक गतिशील रहता है। श्वास के सम्बन्ध में विविध विधियां प्रयुक्त हुई हैं। उन सभी का ध्येय है-अपने चैतन्य में प्रवेश कराना।
स्वरोदय विज्ञान सारा श्वास पर खड़ा है, जिसे शिवजी कहते हैं-'ज्ञानानां मस्तके मणिः' - समस्त ज्ञानों के मस्तिष्क पर यह मणि-सदृश है। 'यह स्वरोदय शास्त्र समग्र शास्त्रों में श्रेष्ठ है। यह आत्मारूपी घड़े को प्रकाशित करने के लिए दीप शिखा की तरह है।' साधारण कार्यों के लिए इसका प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। यह तो आत्मा के द्वारा आत्मा के लिए आत्मा में स्वयं ज्ञेय है, जिसमें साधक श्वास-दर्शन में पूर्णतया जागृत रहता है। श्वास से सुख-दुःख, हानि-लाभ, स्वास्थ्य अस्वास्थ्य, मृत्यु आदि सभी सूचनाएं प्राप्त होती रहती हैं।
श्वास की साधना में प्रस्तुत साधक श्वास के प्रति जागृत रहता है। वह कहां से आता है, कैसे आता है, देखता है। श्वास के साथ कोई श्रम नहीं करता, सिर्फ देखता है और अपने मन को उसके आवागमन के साथ नियोजित कर देता है, शांति और अशांति के साथ उन दोनों के परिणामों को देखता है, केवल तटस्थ भाव से बिना प्रतिक्रिया किये। उसके सहज जो परिणाम आते हैं, उनकी अनुभूति से वह अपरिचित नहीं रहता। श्वास-दर्शन और उस पर एकाग्रता का पहला स्पष्ट प्रभाव तो यह होता है कि उसमें राग-द्वेष, काम-क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, लोभ आदि से उत्पन्न उद्वेग तनावों का अभाव हो जाएगा। ये सब श्वास की उत्तेजना अशांति में होते हैं। शांत श्वास में इनका अस्तित्व असंभव है। श्वास और वृत्तियों का घनिष्ठतम संबंध है। वृत्तियां चंचलता की द्योतक हैं। जैसे कि वृत्ति उत्पन्न होगी श्वास में परिवर्तन आ जायेगा। वृत्तियों का ज्वार नहीं है भीतर, तो श्वास में भी वैषम्य नहीं है। श्वास को शान्त रखेंगे तो वृत्तियां शांत रहेंगी और वृत्तियों को शांत रखेंगे तो श्वास शांत रहेगा। दोनों का अविनाभावी संबंध है।