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सुनहरे क्षणों की अभिवंदना – आचार्य श्री महाश्रमण
जैन शासन को गौरवान्वित करने वाला, अखंड, अनुशासित, समर्पित, मर्यादित तेरापंथ धर्मसंघ, आचार्य परम्परा से सुशोभित है। संघ को एक से बढ़कर एक आचार्य प्राप्त हुए। आचार्य तुलसी की पैनी दृष्टि ने मुनि मुदित को तराशना शुरू किया। वे उनकी हर कसौटी पर खरे उतरे और स्व नियंत्रण के साथ, आत्म संपदा, अध्यात्म संपदा, चारित्र संपदा में अपने आपको समर्पित कर दिया। उनकी विनम्र वैराग्य शैली आकर्षण का केन्द्र बन गई। ये सारी उपमाएं आचार्य महाश्रमण के व्यक्तित्व से जानी जा सकती है।
आचार्य महाश्रमण उच्च कोटि के साधक हैं। कीर्तिमान गढ़ने के लिए उनके चरण गतिमान हैं। उनकी प्रवचन शैली आगम के रत्नों से अनुप्राणित होती है। उनकी स्थित प्रज्ञा मन की एकाग्रता को दर्शाती है। उनका दृष्टि संयम तथा वाणी संयम बेजोड़ है। इस उज्जवल आभामण्डल से क्षमा, मैत्री, करुणा जैसे गुण उनके हर व्यवहार में परिलक्षित हो रहे हैं। उनकी अटूट श्रम निष्ठा, कर्तव्यनिष्ठा, मर्यादा निष्ठा, आचार निष्ठा तथा दायित्व निष्ठा देखकर लाडनूं में आचार्य तुलसी ने उन्हें महाश्रमण पद पर नियुक्त किया। 14 सितंबर 1997 में गंगाशहर में युवाचार्य पद पर नियुक्त किया, तब आचार्य महाप्रज्ञ ने कहा कि महाश्रमण का जीवन पुरुषार्थ व निश्छल व्यक्तित्व का जीवंत दर्शन है और श्रमशीलता की बेजोड़ मिसाल है।
आचार्य महाश्रमण पुण्य उदय के धारक हैं, जिन्हें दो-दो युगप्रधान आचार्यों की अनुभव संपदा प्राप्त है। उनका प्रबंधन और नेतृत्व अद्भुत है। जिनकी शीतल छाया में धर्मसंघ गति-प्रगति के शिखर पर आरोहण कर रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखना। उनकी सोच है कि सच्चा साधु दूसरों की कमियों में नहीं अपनी आत्मा के परिष्कार में आनन्द खोजता है। अहिंसा यात्रा के दौरान जब उन्होंने सम्पूर्ण भारत परिभ्रमण कर मानवीय संस्कार प्रतिष्ठित करने हेतु जन चेतना में शक्ति का सम्प्रेषण किया तथा ध्यान योग की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। युगप्रधान आचार्य महाश्रमण का संयम की प्रेरणा के साथ उठा हुआ हर कदम वर्तमान अपेक्षाओं में प्रासंगिक है तथा युग परिवर्तन में सहायक है। आचार्य महाश्रमण का पट्टोत्सव तथा दीक्षा दिवस आनन्दमय हो, मंगलमय हो।