रचनाएं
अद्भुत मैनेजमेंट की कला
'समयं गोयम मा पमायए' की जागती तस्वीर
सन् 1983 फाल्गुन शुक्ला पंचमी 19 मार्च के मैंने पारमार्थिक शिक्षण संस्था में प्रवेश किया। उस समय उपासिका बहनें (आज की भाषा में बोधार्थी) समणी जी के निर्देशन में अतिथि भवन में रहा करती थीं (जो वर्तमान में शुभम के रूप में पहचाना जाता है)। उस समय समणश्रेणी को शुरू हुए लगभग 2-3 वर्ष ही हुए थे। हम 10 बहनें साथ में भर्ती हुई थीं। मेरा नाम कान्ता था। आप हमें समय-समय पर यही प्रेरणा देतीं कि समय कीमती है इसका जितना सही उपयोग करोगी तो तुम्हारा जीवन बन जाएगा। हमारा आवास अतिथि भवन में था किन्तु खाना खाने के लिए पुरानी संस्था सातवीं पट्टी में थी वहां दिन में तीन बार जाते थे।
आप फरमाते खाने में 5 मिनिट देरी है तो अपना चितारना (में) कर लिया करो। आपस में बातें करके समय नहीं गंवाना। यह तुम्हारे विकास का स्वर्णिम काल है इस प्रकार बात-बात में प्रेरणा देते और संस्कारों को सिंचन देती यह आपकी अप्रमत्त चेतना का प्रतीक है।
समणश्रेणी की प्रथम विदेश यात्रा -
गुरुदेव तुलसी ने समणश्रेणी का प्रारम्भ कई नए उद्देश्यों के साथ किया उसमें एक उद्देश्य यह भी था कि विदेशों में जैन धर्म पहुंचे। उसकी क्रियान्विति के लिए समणी स्मितप्रज्ञा (साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभा) व समणी मधुरप्रज्ञा को पहली बार विदेश की धरती पर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गुरुदेव तुलसी के सपनों को साकार करने के लिए समणीद्वय ने जब लाडनूं विश्व भारती से विदेश यात्रा के लिए प्रस्थान किया उस समय का माहौल प्रसन्नमय व उत्साहयमय था। उस आह्लादमय माहौल को देखने का सौभाग्य मुझे मिला।
उस समय साध्वी कनकश्री शिक्षाकेन्द्र में विराज रही थीं। अतिथि भवन में साध्वीवृंद, समणीवृंद व हम 10 उपासिकाएं साधना कर रही थीं। साध्वीश्री ने हमें एक गीत बनाकर दिया जिसमें विदेश यात्रा की मंगलकामना थी। हमने गीत याद किया। जब समणी जी ने यात्रा के लिए प्रस्थान किया हम उपासिका बहनें अतिथि भवन से रेल्वे स्टेशन तक पहुँचाने गए। गीत गाते हुए रेल्वे स्टेशन तक हम साथ गए क्योंकि आप गुरुदेव तुलसी के सपनों को साकार करने के लिए विदेश यात्रा कर रहे थे। उस समय अद्भुत उल्लास मय वातावरण था। उस उत्साह मय वातावरण को देखने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ। हम छोटी-छोटी नन्हीं-नन्हीं कलियों के संगान के साथ आपकी प्रथम विदेश यात्रा सफल बनी इसका हमें गौरव है।
विश्वास साकार हुआ। सन् 1989 का योगक्षेम वर्ष का पावन प्रसंग। उस समय मैं (साध्वी कान्तप्रभा) पा. शि. स. में मुमुक्षु रूप में थी। बहुत सारे साधु-साध्वी गुरु सन्निधि का लाभ उठा रहे थे। चातुर्मासिक के क्षेत्र प्राय: खाली थे। संस्था की प्राय: बहनों को पर्युषण की यात्रा में भेजा गया (समणी स्मितप्रज्ञा जी - वर्तमान साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभा जी) जो उस समय संस्था की निदेशिका थे - ने मुझसे कहा - तुमको यात्रा में ग्रुप लीडर बना कर भेज रहे हैं। यह बात सुनकर मेरी तो धड़कन तेज हो गई। हाथ पांव ढीले पड़ गए। मैंने कहा - समणी जी, मुझे ग्रुप लीडर नहीं, किसी के साथ भेज दो। मुझे कुछ नहीं आता। मैं वहां जाकर क्या करूंगी। समणी जी ने कहा - तुमको गाना आता है। जिसको गाना आता है वह व्याख्यान भी गाकर उसकी व्याख्या आसानी से कर सकता है। डर किस बात का। मैंने बहुत आनाकानी की। जो काम जिससे करवाना होता है उसे समझाकर करने के लिए तैयार कर देती है ऐसा मुझे अनुभव हुआ। मैं मानती हूं कि मेरे विकास में आपका महत्त्वपूर्ण हाथ रहा है। मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और उस योगक्षेम वर्ष में मैंने स्वतंत्र रूप से दोंडाइचा में पर्युषण पर्व की यात्रा की। यात्रा सम्पन्न कर जब मैं गुरुचरणों में पहुंची,
तब रामणी स्मितप्रज्ञा जी ने मुझसे पूछा- कैसी रही तुम्हारी यात्रा? मैंने कहा- आपकी कृपा से यात्रा अच्छी हो गई। आपका मेरे प्रति किए गए विश्वास ने मेरे भय को दूर कर मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाया और मेरी विकास यात्रा की शुभ शुरुआत आपकी प्रेरणा से ही प्रारम्भ हुई ऐसा मेरा मानना है। आपकी परख ने मेरी क्षमता को उजागर करने का अवसर दिया यह आपकी अद्भुत कला है।