वैभव की अंधी दौड़ और कमजोर नैतिकता ही इंसान को बेईमानी की ओर धकेलती है : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 18 मई, 2026

वैभव की अंधी दौड़ और कमजोर नैतिकता ही इंसान को बेईमानी की ओर धकेलती है : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में ‘प्रमाद कैसे किया जाए’ विषय पर आगम के आलोक में अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने गृहस्थ जीवन की अंतहीन आकांक्षाओं और मृत्यु की अनिश्चितता का जीवंत चित्रण करते हुए संपूर्ण चतुर्विध धर्मसंघ को प्रमाद छोड़कर जागरूकता के पथ पर बढ़ने का पावन पाथेय दिया।
इच्छाओं का अंतहीन चक्र : आचार्य प्रवर ने गृहस्थ जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं से लेकर उसकी अनंत तृष्णाओं के मनोविज्ञान को स्पष्ट करते हुए मुख्य बातें रेखांकित कीं:
१. आवश्यकता बनाम आकांक्षा: गृहस्थ हो या साधु, जीवन संचालन के लिए आहार-पानी पहली आवश्यकता है। इसके बाद गृहस्थ को स्वयं के
घर, कपड़े, आभूषण और परिवार की अपेक्षा होती है।
२.'यह है, यह नहीं है' की दौड़: मनुष्य का मन कभी संतुष्ट नहीं होता। वह निरंतर सोचता है—'घर तो है पर दुकान नहीं, आदमी तो हैं पर कुंडल नहीं।' यही स्थिति राजनीति में है, जहाँ विधायक बनते ही मंत्री बनने की दौड़ शुरू हो जाती है।
३. नैतिकता की कसौटी : यदि मनुष्य में ईमानदारी और नैतिकता के संस्कार पुष्ट हैं, तो वह न्यायपूर्ण तरीके से आजीविका चलाएगा। इसके विपरीत, यदि भीतर का नैतिक भाव कमजोर है, तो वह बेईमानी से भी धन कमाने के प्रपंच में उलझ जाता है।
अनिश्चित काल और प्रमाद का वर्जन: शांतिदूत ने संसारी प्राणियों को सचेत करते हुए फरमाया कि जब मनुष्य 'यह है और यह नहीं है' के इसी ताने-बाने में उलझा रहता है, तभी अचानक मृत्यु आकर उसका हरण कर लेती है।
१. मौत निश्चित, समय अनिश्चित : मृत्यु का आना तो तय है, लेकिन वह किस क्षण आएगी, यह पूरी तरह अज्ञात है। ऐसी अनिश्चित स्थिति में भला कोई जागरूक आत्मा प्रमाद (लापरवाही) कैसे कर सकती है?
२. चिंतन की दिशा बदलें : मनुष्य को भौतिक वस्तुओं के बजाय ज्ञान के क्षेत्र में सोचना चाहिए कि—'मैंने कौन सा आगम पढ़ लिया है और कौन सा पढ़ना बाकी है?'
३.साधना और स्वाध्याय : अपनी पूरी क्षमता के साथ धर्म, साधना, स्वाध्याय और सेवा के कार्यों में समय बिताना ही जीवन का सच्चा पुरुषार्थ है।
योगक्षेम वर्ष की गतिविधियों के संकलन का निर्देश : प्रवचन के दौरान आचार्य प्रवर ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि वर्तमान में 'योगक्षेम वर्ष' गतिमान है। इस पूरे कार्यक्रम की पृष्ठभूमि, प्रशिक्षण कक्षाएं, प्रशिक्षकों के विवरण, गोष्ठियां और निर्णयों जैसी समस्त महत्वपूर्ण सामग्रियों को योजनाबद्ध रूप से एकत्रित और प्रलेखित (Document) किया जाना चाहिए। पूज्य प्रवर ने इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए इच्छुक साधु-साध्वियों को अपने नाम देने की प्रेरणा दी।
अभिव्यक्ति एवं मंगल आशीर्वाद : मंगल प्रवचन के उपरान्त मुनि भरतकुमार जी ने विषय के संदर्भ में अपनी सुंदर अभिव्यक्ति दी। पूज्य गुरुदेव की पावन सन्निधि में उपस्थित समणी प्रतिभाप्रज्ञा जी एवं समणी पुण्यप्रज्ञा जी ने भी अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियां प्रस्तुत कीं तथा सुमधुर गीत का संगान किया। आचार्यश्री ने दोनों समणियों को निरंतर आत्म-विकास का मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।