मन का होना जीवन के विकास का सूचक, इसी से तय होता है मोक्ष और नरक का मार्ग : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 19 मई, 2026

मन का होना जीवन के विकास का सूचक, इसी से तय होता है मोक्ष और नरक का मार्ग : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आज सुधर्मा सभा में ‘आत्मा का स्वरूप’ विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के आलोक में गंभीर दार्शनिक अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने जैन दर्शन के आस्तिकवाद, पुद्गल के लक्षण और मन (संज्ञी चेतना) की दोनों सीमाओं का अत्यंत सूक्ष्म व तार्किक विवेचन किया।
आत्मा का अमूर्त व शाश्वत अस्तित्व : आचार्य प्रवर ने संसार में आत्मा की उपस्थिति और उसके मूल स्वरूप को स्पष्ट करते हुए मुख्य बिंदु रेखांकित किए:
१. आस्तिकवाद का आधार: जो मनुष्य आत्मा के शाश्वत अस्तित्व को स्वीकार करता है, वही पुनर्जन्म, स्वर्ग-नरक और कर्म सिद्धांत को सही मायने में मान सकता है।
२. इंद्रियों से परे : आत्मा में शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श नहीं होते। जिसमें ये पाँचों गुण होते हैं, वह पुद्गल (मूर्त पदार्थ) होता है। आत्मा अमूर्त होने के कारण इंद्रियों की पकड़ में नहीं आती।
३. अखंड और नित्य : जो द्रव्य अमूर्त होता है, वह नित्य होता है।
आत्मा को कभी भी खंडित या टुकड़ों में विभाजित नहीं किया जा सकता। मोक्ष की अवस्था में आत्मा के प्रदेश पूरी तरह स्थिर हो जाते हैं।
मन की शक्ति–मोक्ष का द्वार या सातवीं नरक का रास्ता : शांतिदूत ने संसारी आत्माओं के परिभ्रमण और कर्म बंधन के विज्ञान को समझाते हुए मन (संज्ञी चेतना) की महत्ता पर विशेष प्रकाश डाला।
१. संज्ञी और असंज्ञी का अंतर: जिस प्राणी के पास मन है (संज्ञी), उसी के कर्मों का प्रगाढ़ बंधन होता है। बिना मन वाले (असंज्ञी) प्राणी के ज्यादा पाप का बंध नहीं होता, इसीलिए वे पहली नरक से नीचे नहीं जा सकते।
२.मनुष्य के पास दोनों छोर : मन का होना आत्मिक विकास का सूचक है। यदि मनुष्य अपने मन का दुरुपयोग कर भयंकर दुष्कृत्य करे तो वह सातवीं नरक की घोर यातनाओं तक गिर सकता है। इसके विपरीत, यदि वह इसी मन से धर्म, सेवा और स्वाध्याय करे, तो साधना के उच्च शिखर को छूकर केवलज्ञान और मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है।
दर्शन के विद्वान बनने की
प्रेरणा व जिज्ञासा समाधान : प्रवचन के दौरान युगप्रधान ने शासन गौरव को बढ़ाने का आह्वान करते हुए समस्त साधु-साध्वियों, समणियों और मुमुक्षुओं को जैन दर्शन के क्षेत्र में गहरे स्वाध्याय के साथ उच्च कोटि का विद्वान व विदुषी बनने की पावन प्रेरणा दी। इसके पश्चात, आराध्य ने चारित्रात्माओं द्वारा प्रस्तुत की गई गूढ़ तात्विक जिज्ञासाओं का अत्यंत सरल शब्दों में समाधान किया।
अभिव्यक्ति एवं वंदना : आचार्यश्री की अभिवंदना के क्रम में मुनि कैवल्य कुमार जी एवं मुनि धवल कुमार जी ने विषय के संदर्भ में अपने सुंदर विचार रखे। श्रावक समाज की ओर से संजय भानावत ने सुमधुर श्रद्धा गीत का संगान कर आराध्य के चरणों में अपनी मंगल भावनाएं समर्पित कीं।