गुरुवाणी/ केन्द्र
इंद्रिय सुखों के जाल से मुक्त रहकर अंतस की प्रसन्नता खोजना ही सच्ची साधना : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में ‘तपोधन महासुखी’ विषय पर तात्विक देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने भोगी और त्यागी के जीवन का अंतर स्पष्ट करते हुए मानव जाति को तात्कालिक सुखों के मोह से ऊपर उठकर 'परिणामदर्शी' बनने का पावन संदेश दिया।
किंपाक फल जैसे हैं काम-भोग:
आचार्य प्रवर ने आगम गाथाओं के आलोक में फरमाया कि संसार में दो प्रकार के सुख हैं—एक साधु का सुख जो त्यागी है, और दूसरा संसारी का जो भोगी है। काम-भोगों से मिलने वाला सुख शुरुआत में बहुत अच्छा लग सकता है, लेकिन उसका अंतिम परिणाम अत्यंत कड़वा होता है। इसे स्पष्ट करने के लिए पूज्य प्रवर ने दो मुख्य स्थितियां बताईं:
१. आपात पटु - परिणाम कटु : जो सांसारिक सुख तत्काल में तो बहुत मीठे और अच्छे लगते हैं, लेकिन उनका अंतिम परिणाम केवल दुःख और पतन होता है—जैसे 'किंपाक फल'।
२. आपात कटु - परिणाम पटु : जो साधना, तप और नियम शुरुआत में तो शरीर को कष्टदायक और कड़वे लगते हैं, लेकिन उनका अंतिम परिणाम आत्मा को परम सुख और मोक्ष की ओर ले जाता है।
तप, योग और शम ही साधु का वैभव: शांतिदूत ने संन्यास जीवन की श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हुए फरमाया कि जो आनंद शील गुणों में लीन और वासनाओं से विरक्त भिक्षुओं को मिलता है, वह संसार में दुर्लभ है। एक सच्चे साधु के
जीवन में इन गुणों का होना
अनिवार्य है:
१. तप, योग और शम : यही साधु का वास्तविक और स्थायी धन हैं, जो आत्मा को निखारते हैं।
२. कषायों की मंदता : साधक के जीवन में क्रोध, मान, माया और लोभ बिल्कुल पतले पड़ जाने चाहिए।
३. सरल और भद्र स्वभाव : स्वभाव में सरलता, सेवाभाव, विनय और साधना के प्रति निरंतर जागरूकता ही संतत्व की असली पहचान है।
४. दर्शन से आत्म-लाभ : ऐसे गुणसंपन्न और जागरूक संतों के दर्शन मात्र से ही सांसारिक प्राणियों को सन्मार्ग की प्रेरणा और आत्म-लाभ मिलता है।
जिज्ञासा समाधान एवं परीक्षा हेतु मंगल पाठ : मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्य प्रवर ने चारित्रात्माओं की विविध शंकाओं और जिज्ञासाओं का समाधान किया। आगामी परीक्षाओं में सम्मिलित होने वाली साध्वियों की एकाग्रता और सफलता के लिए गुरुदेव ने विशेष रूप से मंगल पाठ का उच्चारण कर पावन आशीष प्रदान किया।
इस अवसर पर साध्वी पीयूषप्रभा जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी तथा सहवर्ती साध्वियों के साथ सुमधुर गीत का संगान किया। श्रावक समाज की ओर से निलेश बाफना ने श्रद्धा गीत प्रस्तुत किया और बालक सम्यक ने अपनी सुंदर प्रस्तुति से आराध्य के चरणों में वंदना अर्पित की।