मौत से दोस्ती या अमर होने का दावा असंभव, कल पर कार्य टालना भारी भूल : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 17 मई, 2026

मौत से दोस्ती या अमर होने का दावा असंभव, कल पर कार्य टालना भारी भूल : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने 'मृत्यु के समय कोई त्राण नहीं' विषय पर उत्तराध्ययन सूत्र के माध्यम से अमृत देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य को उद्घाटित करते हुए संपूर्ण चतुर्विध धर्मसंघ को आचरण की पवित्रता और कर्म-चेतना के प्रति जागरूक रहने का पावन संदेश दिया।
मृत्यु अटल सच्चाई, कोई रक्षक नहीं:
आचार्य प्रवर ने फरमाया कि इस सृष्टि में प्राणियों का जन्म होता है, परंतु कोई नई आत्मा पैदा नहीं होती; वही आत्माएं बार-बार जन्म ले रही हैं। जहाँ जन्म है, वहाँ मृत्यु भी सर्वथा निश्चित है। इस सत्य को शास्त्रकार के एक जीवंत उदाहरण से स्पष्ट करते हुए पूज्य प्रवर ने फरमाया।
१.​मृग और सिंह का दृष्टांत : जिस प्रकार एक शक्तिशाली सिंह असहाय मृग को झपटकर ले जाता है, ठीक उसी प्रकार काल (मृत्यु) भी मनुष्य को अचानक उठा ले जाता है।
२. कोई वश नहीं चलता : मृत्यु के सामने न स्वयं का पुरुषार्थ काम आता है, न माता-पिता या भाई का स्नेह और न ही किसी डॉक्टर की चिकित्सा। डॉक्टर केवल उपचार का प्रयास कर सकते हैं, जीवन बचाने की गारंटी नहीं दे सकते।
३.​ कल पर कार्य कौन छोड़े? : संसार में केवल तीन ही व्यक्ति अपने कार्य को कल पर टालने के अधिकारी हैं—पहला जिसकी मृत्यु से दोस्ती हो, दूसरा जो मृत्यु से भी तेज़ दौड़ सकता हो, और तीसरा जो स्वयं अमर हो। चूंकि यह तीनों ही स्थितियां असंभव हैं, इसलिए प्रमाद छोड़कर साधना में लगना चाहिए।
कर्म का अनुगमन और असाध्य वेदना:
शांतिदूत ने कर्म सिद्धांत की अकाट्यता पर प्रकाश डालते हुए मुख्य बातें रेखांकित कीं।
१. वेदना का एकाकीपन : यदि शरीर में कोई गंभीर बीमारी आ जाए, तो परिवार या मित्र केवल सेवा-सहयोग कर सकते हैं, लेकिन उस बीमारी से होने वाली शारीरिक और मानसिक वेदना को कोई बांट नहीं सकता। वह अकेले ही भोगनी पड़ती है।
२. बछड़े और गाय का उदाहरण : जिस प्रकार एक छोटा बछड़ा झुंड में भी अपनी माँ (गाय) को ढूंढकर उसके पीछे-पीछे चलता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य द्वारा किए गए अच्छे-बुरे कर्म भी ब्रह्मांड में अपने कर्ता को ढूंढकर उसका अनुगमन करते हैं और फल देते हैं।
पवित्र आचरण के व्यावहारिक सूत्र:
मृत्यु के इस भय से मुक्त होने और भावी जीवन को सुधारने के लिए आचार्यश्री ने आचरण शुद्धि के व्यावहारिक नियम बताए।
अहिंसामय जीवन : धरती पर कदम रखते समय पूरी जागरूकता रखें कि किसी भी सूक्ष्म जीव की हिंसा न हो।
यत्नाचार का पालन : पानी को हमेशा कपड़े से अच्छी तरह छानकर ही उपयोग में लें।
छलरहित व्यवहार : जीवन में सदैव सत्य बोलने का प्रयास करें और हमारा आपसी व्यवहार हर प्रकार की वंचना व छल-कपट से पूरी तरह मुक्त हो।
जिज्ञासा समाधान : मंगल प्रवचन के संपन्न होने के उपरान्त, ज्ञान-चर्चा के क्रम में आचार्य प्रवर ने देश-विदेश से आए श्रावकों और उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा प्रस्तुत की गई विविध तात्विक जिज्ञासाओं का अत्यंत सरल शब्दों में समाधान किया।