चेतना को सांसारिक विषयों से हटाकर अंतस से नाता जोड़ना ही वास्तविक ध्यान : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 15 मई, 2026

चेतना को सांसारिक विषयों से हटाकर अंतस से नाता जोड़ना ही वास्तविक ध्यान : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आज ‘इन्द्रिय संयम की साधना के प्रयोग’ विषय पर जैन विश्व भारती परिसर में गंभीर तात्विक देशना प्रदान की। आचार्यश्री ने बाह्य जगत बनाम आभ्यंतर जगत के रहस्यों को खोलते हुए स्पष्ट किया कि इंद्रियों को रोकना ही भीतर उतरने का एकमात्र मार्ग है। तकनीक बनाम अतीन्द्रिय चेतना: आचार्य प्रवर ने फरमाया कि मानव शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियां और पांच कर्मेन्द्रियां हैं, जो बाहर की दुनिया को जानने का माध्यम हैं। आज विज्ञान और यंत्रों के माध्यम से बहुत दूर (विप्रकृष्ट) और ओझल (व्यवहित) चीजों को देखा जा सकता है, लेकिन यंत्र कभी भी 'अतीन्द्रिय चेतना' की बराबरी नहीं कर सकते। अतीन्द्रिय ज्ञान के द्वारा सूक्ष्म से सूक्ष्म को बिना किसी उपकरण के सीधे आत्मा से जाना जा सकता है।
भीतर उतरना है तो इंद्रियां रोकें: युगप्रधान ने साधना के व्यावहारिक सूत्र प्रदान करते हुए फरमाया कि इंद्रियां केवल बाहर का माध्यम हैं, भीतर का नहीं। यदि लक्ष्य अंतस को जानना है, तो इंद्रियों के प्रयोग को सीमा में बांधना होगा। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी द्वारा करवाए जाने वाले 'सर्वेन्द्रिय संयम' का स्मरण करते हुए गुरुदेव ने कहा कि 'ध्यान' वास्तव में बाहर से संबंध तोड़कर भीतर से नाता जोड़ना ही है। इंद्रिय संयम के व्यावहारिक नियम:
१. चक्षु संयम : दृष्टि को राग-द्वेष से बचाएं, आवश्यकता न हो तो आँखें नीचे रखें।
२. श्रोत्र संयम: कानों को बंद करना संभव न हो, तो चेतना को सुनने के विषयों से हटा लें।
३. रसन व घ्राण संयम : भोजन में विकृति और विमय का वर्जन करें तथा गंध की आसक्ति से बचें।
लेखपत्र का उच्चारण और हाजरी वाचन : आज चतुर्दशी के पावन प्रसंग पर आचार्य प्रवर ने मर्यादा पत्र (हाजरी) का वाचन कर चारित्रात्माओं को शासन के प्रति निष्ठा और जागरूकता की प्रेरणा दी। इस अवसर पर उपस्थित समस्त संतों, साध्वियों और समणियों ने अपने स्थान पर खड़े होकर सामूहिक रूप से लेख पत्र का सहर्ष उच्चारण किया। मंगल प्रवचन के उपरान्त गुरुदेव की अभिवंदना के क्रम में साध्वी स्तुतिप्रभा जी ने सुमधुर गीत का संगान किया और साध्वी वीरप्रभा जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। नन्हे बालक परम और पार्थ बच्छावत ने भी अपनी प्रस्तुति से आराध्य के चरणों में वंदना अर्पित की।