ऊंचा आसन व्यवस्था मात्र, अंतस के सद्गुण ही हैं महानता की असली कसौटी : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 13 मई, 2026

ऊंचा आसन व्यवस्था मात्र, अंतस के सद्गुण ही हैं महानता की असली कसौटी : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने आज ‘तप की महिमा’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान किया। आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि संसार में मनुष्य की वास्तविक कसौटी उसके बाहरी रूप-रंग, वेशभूषा या उच्च पद से नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे ज्ञान, तप और सद्गुणों से होती है।
साधारण वेश में भी विराजमान हो सकता है विराट व्यक्तित्व : आचार्य प्रवर ने फरमाया कि इस संसार में लोग वक्तृत्व, कला या साहित्य के माध्यम से प्रसिद्धि प्राप्त कर सकते हैं, किंतु तपस्या का वैभव साक्षात् दिखाई देता है। यदि कोई साधक सामान्य कुल में जन्मा हो, मैले वस्त्रों में हो या हीन जाति का हो, परन्तु यदि उसका संयम और तप उच्च कोटि का है, तो वह 'तपोधन' बनकर सर्वत्र पूजनीय हो जाता है। कपड़े और शारीरिक सुंदरता मात्र बाहरी आवरण हैं। आवश्यक नहीं कि अच्छे वस्त्र पहनने वाला ही ज्ञानी या महान हो; साधारण काया और सामान्य पोशाक में भी एक विराट आत्मा निवास कर सकती है।
स्थान नहीं, योग्यता और गुण हैं असली कसौटी : मर्यादाओं और व्यवस्थाओं पर प्रकाश डालते हुए शांतिदूत ने फरमाया कि किसी का उच्च स्थान या ऊंचे आसन पर बैठना मात्र एक व्यवस्थागत 'प्रोटोकॉल' हो सकता है। कोई नीचे बैठने वाला व्यक्ति भी अपने गुणों के कारण महान हो सकता है। असली मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि आत्मा में कितना ज्ञान है, जीवन में कितनी तपस्या है और अंतस में कितने सद्गुण रूपी आभूषण हैं।
प्रतिकूलताओं में समता : आचार्य तुलसी का प्रेरक प्रसंग : जीवन के उतार-चढ़ावों का जिक्र करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि अनुकूलता और प्रतिकूलता—दोनों ही स्थितियों में साधक को धैर्य और समता का परिचय देना चाहिए। युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी का प्रेरक उदाहरण देते हुए पूज्य प्रवर ने बताया कि आचार्य तुलसी के जीवन में अनेक बाह्य और आंतरिक प्रतिकूलताएं आईं, परंतु उन्होंने समता और शांति के महामंत्र से हर परिस्थिति का वीरतापूर्वक मुकाबला किया। हमें भी अपनी आत्मा को तपोमय संयम से भावित करने का निरंतर पुरुषार्थ करना चाहिए।
संवाद और गीतों से गुरु-अभिवंदना: प्रवचन के उपरांत आचार्यश्री के जन्मोत्सव एवं पट्टोत्सव के उपलक्ष्य में वर्धापना का क्रम आज भी उत्साहपूर्वक जारी रहा। इस कड़ी में मुनि अजितकुमार जी, मुनि देवेंद्रकुमार जी, मुनि मृदुकुमार जी, मुनि वर्धमानकुमार जी एवं मुनि धैर्यकुमार जी ने संयुक्त रूप से एक सुंदर आध्यात्मिक संवाद प्रस्तुत किया। मुनि देवर्यकुमार जी, साध्वी परमार्थप्रभा जी, साध्वी करुणप्रभा जी और साध्वी नंदिताश्री जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। श्रावक समाज की ओर से श्री अमित सिंघी ने गुरु चरणों में सुमधुर श्रद्धा-गीत अर्पित किया।