संस्थाएं
समाज और संस्कृतियों को जोड़ता है अणुव्रत
अणुव्रत समिति, चेन्नई द्वारा रविवार को सी यू शाह, पुरूषवाक्कम में ‘स्वस्थ समाज के निर्माण में सामाजिक संस्थाओं की भूमिका’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य तुलसी द्वारा रचित अणुव्रत गीत ‘संयममय जीवन हो’ के सामूहिक संगान से संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। अध्यक्षा सुभद्रा लुणावत ने अपने स्वागत-भाषण में संगोष्ठी की थीम के बिंदु स्वार्थ- स्वयं निखरें, परार्थ- परिवार व समाज निखरें और परमार्थ- चेतना निखरें पर विचार रखे। जैन अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन (जीतो) चेन्नई चैप्टर के अध्यक्ष राजेश चंदन ने बतौर मुख्य अतिथि कहा कि जैनाचार्य तुलसी ने सर्व समाज सुधार उद्देश्य से आज से 75 वर्ष पूर्व अणुव्रत आंदोलन का प्रर्वतन किया। अणुव्रत यानी छोटे-छोटे व्रत-नियम। ये छोटे-छोटे नियम व्यक्ति को बड़ा बनाते हैं। अणुव्रत के जरिए व्यक्ति, समाज और संस्कृतियों को जोड़ा जा सकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अणुव्रत विश्व भारती सोसाइटी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कैलाश बोराणा ने अणुव्रत आचार संहिता का वाचन किया और अणुव्रत समिति चेन्नई की इस अभिनव पहल की प्रशंसा की। तमिलनाडु अल्पसंख्यक आयोग सदस्य पी. राजेन्द्रप्रसाद जैन ने पूर्व में प्रकाशित तमिल भाषा में अणुव्रतम् पत्रिका को पुनः शुरू करने का आग्रह किया, तो विशिष्ट अतिथि जैन महासंघ के अध्यक्ष प्यारेलाल पितलिया ने इसकी बहाली के लिए आश्वस्त किया। विशिष्ट अतिथि विजयराज कटारिया ने कहा कि अणुव्रत हमें जीने की कला सिखाता है। मुख्य वक्ता राकेश खटेड़ ने कहा कि हर संस्था अच्छा कार्य कर रही हैं। यह आचार-विचार के आदान-प्रदान का मंच है। हम अच्छाइयों को आपस में साझा करके समाज विकास में योगदान करें। उन्होंने कहा कि ‘देहरी-दीपक न्याय’ के अनुसार अणुव्रत अंदर और बाहर, दोनों तरफ उजाला करता है। यह मानव को दुर्गति से बचाता है। अणुविभा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री राजेश चावत ने बताया कि अणुव्रत अभियान की गूंज गाँव की चौपाल से लेकर राष्ट्रपति भवन और संयुक्त राष्ट्र तक पहुँची है। ‘एलीवेट’ राष्ट्रीय प्रभारी मुदित भंसाली ने पीपीटी के साथ नशा-मुक्ति पर अपना प्रभावी व्यक्तव्य दिया।
उन्होंने उदाहरण देकर कहा कि जब भारत के प्रधानमंत्री नशा को ‘ना’ कह सकते हैं तो हमें भी हमारी व्यसन-मुक्त जीवनशैली पर कायम रहना चाहिए। सुखी परिवार और समर्थ समाज के लिए नशामुक्ति अनिवार्य है। कार्यक्रम संयोजक, उपाध्यक्ष डॉ. दिलीप धींग ने कहा कि तीर्थंकर महावीर ने गृहस्थ के लिए पाँच अणुव्रत दिए, तो भगवान बुद्ध ने पंचशील और पतंजलि ने पाँच यम के रूप में उन्हें आगे बढ़ाया। आचार्य हेमचंद्र, हीरविजय, जैन दिवाकर, शांतिविजय आदि संतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने आचार्य तुलसी द्वारा प्रवर्तित अणुव्रत आंदोलन की बात कही।