संस्थाएं
तेरापंथ मेरापंथ कार्यशाला का आयोजन
परम पूज्य आचार्य श्री महाश्रमणजी की विदुषी शिष्या शासन श्री साध्वी कंचनप्रभाजी, शासन श्री साध्वी मंजुरेखाजी आदि ठाणा ५ के सान्निध्य तेरापन्थ सभा भवन में 'तेरापंथ मेरा पंथ' कार्यशाला का शुभारम्भ साध्वी वृन्द द्वारा नमस्कार महामंत्र के समुच्चारण पश्चात् उपासक हस्तीमल डांगी ने श्रद्धा प्रणत गीत का संगान किया। विशाल धर्म सभा को प्रेरणा प्रदान करते हुए शासन श्री साध्वी कंचनप्रभाजी ने कहा - भगवान महावीर के शासन में चारित्र का सर्वोत्कृष्ट मूल्य है परन्तु आगम का एक वाक्य— 'नत्थि चरित्तं सम्मत्त विहुणं' सम्यक्त्व के बिना चारित्र नहीं। यह आगम वाणी आचार्य भिक्षु के अन्तःकरण को उद्वेलित कर रही थी। आखिर अनेक संघर्षों को गले लगाकर उन्होंने सम्यक्त्व का रास्ता तय किया। उन्होंने कहा - हिंसा हिंसा है, एकेन्द्रिय की हिंसा से पंचेन्द्रिय का पोषण अहिंसा नहीं, पुण्य भी नहीं।
इसी का नाम तेरापंथ है। आज तेरापंथ के आचार्य पट्ट पर ११वें पट्टधर परम श्रद्धेय आचार्य श्री महाश्रमणजी विराजित हैं, जिनकी आज्ञा में चारित्रात्माओं का विशाल परिवार है। योगक्षेम वर्ष अपने आप में जैन धर्म का साईंस है। शासनश्री साध्वी मंजु रेखाजी ने कहा— लौकिक दया और लोकोत्तर दया को समझना बहुत जरूरी है। आचार्य भिक्षु के सिद्धान्त प्रासंगिक हैं। जिन्होंने सैकड़ों साल पहले अनुशासन और दिशा बोध समझाकर सम्यकत्व का मार्ग गले उतारा था। मिथ्यात्व का अंधेरा मिटाने के लिए उन्होंने कठिनाइयों को झेलकर भी भगवान महावीर के सिद्धान्तों को जन-जन तक पहुँचाया और सही मंजिल तय की। प्रशिक्षक उपासक रतन सियाल ने छोटे-छोटे उदाहरण से प्रतिमा पूजा, दान, दया पर प्रकाश डाला। मुंबई सभा के अध्यक्ष माणक घींग ने विचार रखे और कार्यशाला प्रदाता की प्रशंसा की। सभाध्यक्ष शान्तिलाल कोठारी, मंत्री संजय सोनी, महिला मण्डल अध्यक्षा मंजु बड़ाला तथा उनकी टीम सक्रिय रहे। उपाध्यक्ष सुरेश राठौड़ ने आभार व्यक्त किया। साध्वी वृन्द की तत्व परख गीतिका ने कार्यशाला में रंग भर दिया।